सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४ सूर्य सिद्धान्त शास्त्रमाद्यं तदेवेदं यत्पूर्वं प्राह भास्करः । युगानां परिवर्तेन कालभेदोऽत्र केवलम् ॥६॥ अनुवाद—इतना कह कर सूर्य भगवान अन्तर्ध्यान हो गये और सूर्यांश पुरुष ने, आदेशानुसार, मय से जो विनीत भाव से झुके हुए और हाथ जोड़े हुए थे कहा— एकाग्र चित होकर यह उत्तम ज्ञान सुनो, जिसे भगवान सूर्य ने स्वयम् समय-समय पर महर्षियों से कहा था; भगवान सूर्य ने पहले जिस शास्त्र का उपदेश दिया था वही आदि शास्त्र यह है; युगों के परिवर्तन से केवल काल में कुछ भेद पड़ गया है ॥७-६॥ विज्ञान भाष्य—नवें श्लोक के दूसरे पद का कुछ लोग यह अर्थ करते हैं कि सूर्य भगवान ने जिस शास्त्र का उपदेश महर्षियों को किया था वही शास्त्र बिना किसी परिवर्तन के यह है, केवल कहने के समय में भेद है । परन्तु यदि इसका यही अर्थ होता तो यह कहने की क्या आवश्यकता थी कि केवल काल में भेद है, पहले पद में जो कुछ कहा गया है वही पर्याप्त था। इसलिए इस पद का अधिक युक्तियुक्त अर्थ यह है कि पहले के बतलाये हुए और इस समय बतलाये जाने वाले ज्योतिः- शास्त्र में यदि कुछ भेद है तो वह काल के कारण हो गया है, तत्वतः कोई अन्तर नहीं है। काल के कारण भेद कैसे हो सकता है; इसका कारण यह है कि ज्योतिः- शास्त्र प्रयोगात्मक विज्ञान है और प्रयोग में कुछ न कुछ सूक्ष्म भूल रह ही जाती है, जिसे प्रयोगात्मक भूल (Experimental error) कहते हैं। ज्योतिःशास्त्र में यह भूल प्रति वर्ष इकट्ठी होती रहती है और सैकड़ों वर्ष के बाद वह बहुत बड़ा रूप धारण कर लेती है; इसलिए समय-समय पर उसका संशोधन करना पड़ता है, जिसको बीज-संस्कार कहते हैं। इसी दृष्टि से यह वाक्य सूर्यांश पुरुष ने कहा है जिसके प्रमाण में सूर्य सिद्धान्त के अन्तिम अध्याय में 'बीजोपनयन' नाम के २१ श्लोक हैं, जिनकी टीका रंगनाथ जी ने तथा पं० इन्द्रनारायण द्विवेदी जी ने क्षेपक मान कर नहीं की है और क्षेपक मानने का कारण यह बतलाया है कि सूर्य भगवान के कहे हुए शास्त्र में बीज-संस्कार स्वयम् सूर्य भगवान कैसे करते । परन्तु रंगनाथ जी अपनी गूढ़ार्थ-प्रकाशिका टीका में ६ वें श्लोक की व्याख्या करते हुए यह भी बतलाते हैं कि काल पाकर कुछ अन्तर हो जाया करता है। उनके वाक्य ज्यों के त्यों यह हैं:— “तथा च कालवशेन ग्रहचारे किञ्चिद्वैलक्ष्यण्यं भवतीति युगान्तरे तत्तदनन्तरं ग्रहचारेषु प्रसाध्य तत्कालस्थित लोकव्यवहारार्थं शास्त्रान्तरमिव कृपालुरुक्तवानिभि- नानन्तर शास्त्राणां वैयर्थ्यम् । एवञ्च मया वर्तमान युगीय सूर्योक्त शास्त्र सिद्धग्रहचार- मंगीकृत्याद्य सूर्योक्त शास्त्रसिद्ध' ग्रहचारं च प्रयोजनाभावादुपेक्ष्य तदुक्तमेवत्वां प्रत्युपदिश्यत इति भावः । एवञ्च युग मध्येऽप्यवान्तर काले ग्रहचारोष्वन्तर दर्शने तत्तत्काले तदन्तरं