भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

२८६ सूर्य-सिद्धान्त स्वशंकुना विभज्याप्ते दृक्त्रिज्ये द्वादशाहते । छायाकणौ तु कोणेषु यथास्वं देशकालयोः ।।३३।। अनुवाद—(३३) दृग्ज्या और त्रिज्या को १२ से गुणा करके कोण शंकु से भाग दो । भागफल क्रमानुसार इष्ट स्थान के यथासमय छाया और कर्ण होंगे । विज्ञान भाष्य—२८-३२ श्लोकों में यह बतलाया गया है कि जब सूर्य आग्नेयादि विदिशाओं में हो तब उस समय की उन्नतांश ज्या (कोण शंकु) और नतांश ज्या (दृग्ज्या) कैसे निकालते हैं । ३३वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि दृग्ज्या और कोण शंकु से उस समय की छाया या छायाकर्ण कैसे निकाला जाता है । इस नियम का सार यह है :— (कोण) छाया = दृग्ज्या x १२ / कोण शंकु (कोण) छायाकर्ण = त्रिज्या x १२ / कोण शंकु यह २१वें श्लोक से मिलता-जुलता है । इसलिए इसकी उपपत्ति भी उसी तरह है । उदाहरण—जब सूर्य की क्रान्ति १५° उत्तर या दक्षिण हो तो प्रयाग में (अक्षांश २५° २५') कोण शंकु और दृग्ज्या क्या होंगे ? प्रयाग का विषुवतकर्ण = १३.२८ अंगुल ,, की पलभा = ५.६८ अंगुल इसलिए उस दिन की उदयकालिक अग्राज्या = (ज्या १५° x १३.२८) / १२ [ देखो श्लोक २२ ] = (८६० x १३.२८) / १२ = ६८५' करणी = ((त्रिज्या² / २) - अग्राज्या²) x १४४ / (७२ + पलभा²) = ((५६०६६२२ - ४७०२२५) १४४) / (७२ + ३२.२६) = (४६३६६६७ x १४४) / १०४.२६ = ६८२२५२४