भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार २८५ — ज्या (अग्रा) x ज्या (नतांश) x कोज्या (अक्षांश) = — ज्या (क्रान्ति) — कोज्या (नतांश) x ज्या (अक्षांश) जिसमें ज्या अग्रा, ज्या क्रान्ति इत्यादि के मान उत्थापन करने और सरल करने से — १/√२ x ज्या (न) x १२ = — १२ अ — प x कोज्या (न) अथवा १/√२ x १२ x ज्या (न) = १२ अ + प x कोज्या (न) दोनों पक्षों का वर्ग करने से १२²/२ x ज्या² (न) = १२² अ² + प² x कोज्या² (न) + २ x १२ x अ x प x कोज्या न अथवा १२²/२ [ त्रिज्या² — कोज्या² (न) ] = १२² अ² + प² x कोज्या² (न) + २ x १२ x अ x प x कोज्या (न) ∴ १२² [ त्रिज्या²/२ — अ² ] = कोज्या² (न) [ १२²/२ + प² ] + २ x १२ x अ x प x कोज्या न ∴ कोज्या² (न) + (२ x १२ x अ x प) / (१२²/२ + प²) कोज्या (न) = (१२² [ त्रिज्या²/२ — अ² ]) / (१२²/२ + प²) अथवा कोज्या² (न) + २ x फल x कोज्या (न) = करणी ∴ [कोज्या (न) + फल]² = करणी + फल² ∴ कोज्या (न) + फल = √(करणी + फल²) ∴ कोज्या (न) = √(करणी + फल²) — फल इसलिए यह सिद्ध होता है कि जब सूर्य की क्रान्ति दक्षिण होती है तब फल घटाना पड़ता है ।