सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
DevanagariHindipublished838 पृष्ठ
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२८४ सूर्य-सिद्धान्त अथवा सरल करने पर १२२ [ त्रिज्या२/२ - अ२ ] = कोज्या२ (न) [ १२२/२ + प२ ] - २ x १२ x अ x प x कोज्या (न) प्रत्येक पक्ष को १२२/२ + प२ से भाग देने पर और आवश्यक पदों को एक पक्ष से दूसरे पक्ष में ले जाने पर कोज्या२ (न) - २ x १२ x अ x प / (१२२/२ + प२) कोज्या (न)
- १२२ [ त्रिज्या२/२ - अ२ ] / (१२२/२ + प२) = ० तीसरे पद की जगह करणी और दूसरे पद के १२ x अ x प / (१२२/२ + प२) की जगह फल लिखने से इसका रूप होगा कोज्या२ (न) - २ x फल x कोज्या (न) - करणी = ० या कोज्या२ (न) - २ फल x कोज्या (न) = करणी पहले पक्ष को पूर्ण वर्ग बनाने के लिए प्रत्येक पद में (फल)२ जोड़ने से कोज्या२ (न) - २ फल x कोज्या (न) + फल२ = करणी + फल२ इस समीकरण का पहला पक्ष = [कोज्या (न) - फल]२ ∴ कोज्या (न) - फल = √करणी + फल२ अथवा कोज्या (न) = फल + √करणी + फल२ परंतु कोज्या (न) = कोज्या (नतांश) = ज्या (उन्नतांश) = कोण शंकु ∴ कोण शंकु = √करणी + फल२ + फल इसलिए यह सिद्ध हुआ कि जब सूर्य की क्रान्ति उत्तर होती है तब फल के वर्ग को करणी में जोड़कर और योगफल का वर्गमूल निकालकर फल में जोड़ देने से कोण शंकु आ जाता है। यदि सूर्य की क्रान्ति दक्षिण हो तो चित्र ५८ के अनुसार