सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० सूर्य-सिद्धान्त (२) छेद = (अन्त्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या त्रिज्या (३) शंकु = छेद ✕ लम्बज्या त्रिज्या (४) दृग्ज्या = √त्रिज्या² — शंकु ² समीकरण (३) में समीकरण (२) और (१) के मान उत्थापन करने से, शंकु = (अन्त्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या ✕ लम्बज्या त्रिज्या त्रिज्या = (त्रिज्या ± चर ज्या - नतोत्क्रमज्या) ✕ द्युज्या ✕ लम्बज्या त्रिज्या त्रिज्या = (त्रिज्या - नतोत्क्रमज्या ± चरज्या) द्युज्या ✕ लम्बज्या त्रिज्या² = (नतकोटिज्या ± चरज्या) द्युज्या ✕ लम्बज्या † त्रिज्या² = (नतकोटिज्या ± चरज्या) ✕ क्रान्तिकोटिज्या त्रिज्या² ✕ अक्षांश कोटिज्या................(क)* यह बात गोलीय त्रिकोणमिति से सहज ही सिद्ध हो सकती है । यहाँ कुछ नये शब्द आये हैं इसलिए पहले उनका समझाना आवश्यक है:— अन्त्या—चित्र ४२ में चरज्या चा श और च श है और वि श त्रिज्या है । इसलिए चा वि और च वि क्रम से अन्त्या हुए । नत काल—किसी समय से जितनी देर में कोई ग्रह या तारा याम्योत्तर वृत्त पर आता है उसको उस ग्रह या तारे का पूर्व नत काल कहते हैं और उस तारे या ग्रह के याम्योत्तर वृत्त लांघने के बाद जितना समय बीता रहता है उसको उस तारे या ग्रह का पच्छिम नत काल कहते हैं । किसी ग्रह या तारे का नत काल (hour angle) और क्रान्ति दी हुई हो तो उसका स्थान सहज ही निश्चय किया जा सकता है । नत काल का परिमाण उस कोण से जाना जाता है जो ग्रह या तारे के ध्रुवप्रात वृत्त और याम्योत्तर वृत्त के बीच में होता है । ध्रुवप्रातवृत्त विषुवद्वृत्त से समकोण बनाता है, इसलिए नत काल विषुवद्वृत्त के उस धनु से भी जो तारे या ग्रह के ध्रुव †देखो चित्र २४ और पृष्ठ ११६, ११८-११६
- देखो पृष्ठ २०८