भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

त्रिप्रश्नाधिकार २६५ किसी समय की छाया नापकर नतकाल जानना — अभीष्टच्छायाऽभ्यस्ता त्रिज्या तत्कर्णभाजिता । दृग्ज्या तद्वर्गसंशुद्धात् त्रिज्यावर्गाच्च यत्पदम् ॥३६॥ शङ्कुस्य त्रिभजीवाघ्नः स्वलम्बज्याविभाजितः । फलं त्रिभज्ययाऽभ्यस्तं स्वाहोरात्रार्धभाजितम् ॥३७॥ उन्नतज्या तया हीना स्वान्त्या शेषस्य कार्मुकम् । उत्क्रमज्या।भरेवं स्यात्प्राक्पश्चाच्च नतासवः ॥३८॥ अनुवाद—(३६) इष्टकाल की छाया को त्रिज्या से गुणा करके छायाकर्ण से भाग देने पर दृग्ज्या आती है। त्रिज्या के वर्ग से दृग्ज्या के वर्ग को घटा कर वर्गमूल निकालने से (३७) शंकु प्राप्त होता है। शंकु को त्रिज्या से गुणा करके इष्ट स्थान की लम्बज्या से भाग देने पर छेद आता है। छेद को त्रिज्या से गुणा करके द्युज्या से भाग देने पर (३८) उन्नतज्या आती है। इसको अन्त्या से घटाने पर जो शेष बचता हो उसको उत्क्रमज्या समझ कर उत्क्रमज्या पिंड से धनु बनावे तो पूर्व या पच्छिम नतकाल ज्ञात होता है । विज्ञान भाष्य—इन तीनों श्लोकों का सारांश यह है :— (१) छाया × त्रिज्या / छाया कर्ण = दृग्ज्या (२) √(त्रिज्या² - दृग्ज्या²) = शंकु (३) शंकु × त्रिज्या / लम्बज्या = छेद (४) छेद × त्रिज्या / द्युज्या = उन्नतज्या (५) अन्त्या - उन्नत ज्या = नतोत्क्रमज्या इन तीन श्लोकों के नियम ३४-३५ श्लोकों में लिखे हुए नियम के विलोम हैं इसलिए उनकी उपपत्ति भी वही है । हाँ, यहाँ छाया से दृग्ज्या अर्थात् नतांश ज्या का मान १३वें श्लोक में बतलाये गये नियम की तरह जानना चाहिए । यह पहले ही बतलाया गया है कि शंकु और छायाकर्ण के बीच का कोण नतांश होता है इसलिए छाया को छाया कर्ण से भाग देने पर दशमलव भिन्न में तथा इस फल को त्रिज्या से गुणा करने पर कलाओं में नतांश ज्या का मान निकल आवेगा । इस रीति के सम्बन्ध में पंडित इन्द्रनारायण जी द्विवेदी लिखते हैं, "यद्यपि ३४-३५ श्लोकों के विपरीत गणना से ही ऊपर के श्लोकों में नतकाल बनाने की