सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सूर्य सिद्धान्त कलियुग चार युग होते हैं; जिनके मान धर्म के चरणों के अनुसार होते हैं। चतुर्युग के दसवें भाग का चार गुना सत्ययुग, तीन गुना त्रेता, दो गुना द्वापर और एक गुना कलियुग होता है। प्रत्येक युग के छठें भाग के समान उसकी दोनों संध्याएँ होती हैं ॥ १५-१७ ॥ विज्ञान-भाष्य—१४वें श्लोक में बतलाया गया है कि सुरों या असुरों के ३६० दिन का एक दिव्य वर्ष होता है। तेरहवें श्लोक में बतलाया गया है कि देवताओं का एक दिन एक सौर वर्ष के समान होता है इसलिए यह स्पष्ट है कि देवताओं का एक वर्ष ३६० सौर वर्षों के समान हुआ। १५वें श्लोक के अनुसार १२००० दिव्य वर्षों का अथवा १२००० × ३६० (अर्थात् ४३२००००) सौर वर्षों का एक चतुर्युग होता है। चतुर्युग को महायुग भी कहते हैं। एक महायुग में चार युग सत्ययुग; त्रेता, द्वापर और कलियुग होते हैं इसीलिए इसको चतुर्युग भी कहते हैं। सत्ययुग में धर्म चार चरण होता है, त्रेता में तीन चरण, द्वापर में दो चरण और कलियुग में एक चरण । इसी तरह एक महायुग में सत्ययुग चार भाग, त्रेता तीन भाग, द्वा.पर दो भाग और कलियुग एक भाग होता है। इसलिए दिव्य वर्षों में सौर वर्षों में दोनों संध्याओं सहित सत्ययुग का मान हुआ ४८०० १७२८००० ;, त्रेता ,, ३६०० १२९६००० ,, द्वापर ,, २४०० ८६४००० ;; कलियुग ,, १२०० ४३२००० महायुग १२००० ४३२०००० प्रत्येक युग की दोनों सन्ध्याएँ उसके छठें भाग के समान होती हैं इसलिए एक संध्या (सन्धि-काल) बारहवें भाग के समान हुई। युग के आदि में जो संध्या होती है उसको आदि संध्या और अन्त में जो संध्या होती है उसको संध्यांश कहते हैं। इनके मान यह हुए :— दिव्य वर्षों में सौर वर्षों में सत्ययुग की आदि वा अन्त संध्या ४०० १४४००० त्रेता की ,, ,, ३०० १०८००० द्वापर की ,, ,, २०० ७२००० कलियुग की ,, ,, १०० ३६००० जैसे एक, अहोरात्र में प्रातः और सायं दो संध्याएँ होती हैं वैसे ही चतुर्युग के प्रत्येक युग में दो संध्याएँ होती हैं, एक आरम्भ में और एक अन्त में।