सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार ११ युगानां सप्ततिस्सैका मन्वन्तरमिहोच्यते । कृताब्दसङ्ख्या तस्यान्ते सन्धिः प्रोक्तो जलप्लवः ॥१८॥ ससन्धयस्ते मनवः कल्पे ज्ञेयाश्चतुर्दश । कृतप्रमाणः कल्पादौ संधिः पञ्चदश स्मृताः ॥१९॥ अनुवाद—७१ महायुगों का एक मन्वन्तर होता है, जिसके अंत में सत्ययुग के समान संध्या होती है। इसी संध्या में जलप्लव होता है। संधि सहित १४ मन्वन्तरों का एक कल्प होता है, जिसके आदि में भी सत्ययुग के समान एक संध्या होती है; इसलिए एक कल्प में १४ मन्वन्तर और १५ सत्ययुग के समान संध्याएँ हुईं ॥१८-१९॥ विज्ञान भाष्य—चतुर्युग के प्रत्येक युग में दो संध्याएँ मानी गयी हैं; परन्तु मन्वन्तर के केवल अंत में एक संध्या मानी गयी है जिसका मान सत्ययुग के समान होता है। १ मन्वन्तर ७१ महायुगों का अर्थात् ७१ × ४३२०००० = ३०६७२०००० सौरवर्षों का होता है। प्रत्येक मन्वन्तर के अंत में १७२८००० सौर वर्षों की एक संध्या होती है तथा कल्प के आदि में भी इसीके समान एक संध्या होती है। इस प्रकार १ कल्प = १४ मन्वन्तर + १५ सत्ययुग के समान संध्याएँ = १४ × ७१ महायुग + १५ सत्ययुग = ९९४ महायुग + (१५ × ४) / १० महायुग [क्योंकि सत्ययुग = महायुग का ४/१० ] = ९९४ + ६ महायुग = १००० महायुग अथवा = १००० × १२००० = १२०००००० दिव्य वर्ष अथवा = १००० × ४३२०००० = ४३२००००००० सौर वर्ष महायुग अथवा मन्वन्तर के यह मान मनुस्मृति इत्यादि धर्मशास्त्रों से मिलते हैं; परन्तु आर्यभट ने अपने आर्यभटीय में युगों के मान कुछ भिन्न दिये हैं। इनके अनुसार १ कल्प में १४ मनु और १ मनु में ७२ चतुर्युग के प्रत्येक युग सत्ययुग त्रेता, द्वापर और कलियुग समान १ होते हैं । इस प्रकार स्पष्ट है कि आर्यभट के अनुसार एक कल्प में १४ × ७२ = १००८ चतुर्युग होते हैं । १. देखिये २३वें श्लोक का विज्ञान भाष्य ।