सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 332, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३०६ विन्दु पर मिलता है । इसलिए विषुवद्वृत्त का व पू च भाग का विन्दु का विषुवांश है । लंका में क्रान्तिवृत्त का का विन्दु और विषुवद्वृत्त का च विन्दु एक साथ क्षितिज पर आते हैं जैसा कि अभी बतलाया गया है । परन्तु अ अक्षांश पर पू च भाग क्षितिज के नीचे ही रहता है जब का विन्दु अ अक्षांश में क्षितिज पर आ जाता है । इसलिए अ अक्षांश के स्थान में व का के उदयासु व पू के उदयासुओं के समान हैं जो व पू च से पू च घटाने पर आता है। पृष्ठ २०६—२१० में बतलाया गया है कि यही पू च का विन्दु का चर-काल है। इसलिए यह सिद्ध हुआ कि लंका के उदयासुओं में से चर- काल घटाने पर इष्ट स्थान के उदयासु निकलेंगे । पृष्ठ २१० में बतलाया गया है कि चर ज्या = क्रान्ति स्पर्शरेखा X अक्षांश स्पर्शरेखा । (१) जब व का = ३०° तब का की क्रान्ति = ११°२६′ इसलिए प्रयाग में जिसका अक्षांश २५°२५′ है, का विन्दु की चर ज्या = स्परे ११°२६′ X स्परे २५°२५′ = •२०३२ X •४७५२ = •०९६६ ∴ चरांश = ५°३३′ ∴ का विन्दु के चरासु = ३३३ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = १६७५ - ३३३ = १३४२ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष के उदयासु = १३४२ (२) जब व का = ६०° तब का की क्रान्ति = २०°६′·७ = २०°१०′ इसलिए तब प्रयाग में का की चरज्या = स्परे २०°१०′ X स्परे २५°२५′ = •३६७१ X •४७५२ = •१७४५ ∴ का का चरांश = १०°३′ ∴ का के चरासु = ६०३ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = ३४६६ - ६०३ = २८६६ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष और वृष राशियां २८६६ असुओं में उदय होंगी । परन्तु सायन मेष राशि १३४२ असुओं में उदय होती है । इसलिए सायन वृष राशि २८६६ - १३४२ = १४२४ असुओं में उदय होगी ।