भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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३१० सूर्य-सिद्धान्त (३) जब व का = ९०° तब का की क्रान्ति = २३°२७' ∴ प्रयाग में का की चरज्या = स्परे २३°२७' x स्परे २५°२५' = ४३३७ x ४७५२ = २०६१ ∴ का का चरांश = ११°५४' ∴ का के चरासु = ७१४ ∴ प्रयाग में व का के उदयासु = ५४०० - ७१४ = ४६८६ अर्थात् प्रयाग में सायन मेष, वृष और मिथुन राशियाँ ४६८६ असुओं में उदय होंगी । परन्तु सायन मेष और वृष राशियाँ २८६६ असुओं में उदय होती हैं, इसलिए सायन मिथुन राशि ४६८६ - २८६६ = १८२० असुओं में उदय होंगी । इस तरह यह प्रकट है कि सायन मेष के अन्तिम विन्दु के चरासु ३३३, सायन वृष के अन्तिम विन्दु के चरासु ६०३ और सायन मिथुन के अन्तिम विन्दु के चरासु ७१४ हैं। पहले और दूसरे का अन्तर २७०, तथा दूसरे और तीसरे का अन्तर १११ है । इन्हीं को वृष और मिथुन के चरखंड ४३वें श्लोक के उत्तरार्ध में कहा गया है जिसका तात्पर्य नीचे के कोष्ठक से स्पष्ट हो जायगा :—

सायन राशियाँलंका में उदयासुचरखंड असुओं मेंप्रयाग में उदयासु
मेष१६७५- ३३३१३४२
वृष१७९४- २७०१५२४
मिथुन१९३१- ११११८२०

४४वें श्लोक के पूर्वार्ध में यह बतलाया गया है कि सायन कर्क, सिंह और कन्या राशियों के उदयासु किस प्रकार ज्ञात होंगे। लंका में कर्क के उदयासु वही होंगे जो मिथुन के हैं, सिंह के वह होंगे जो वृष के हैं और कन्या के वह होंगे जो मेष के हैं। इनमें अपने-अपने चरखंड जोड़ने पर इष्ट स्थान के उदयासु निकल आवेंगे जो आगे के कोष्ठक से स्पष्ट होगा :—