भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 334

त्रिप्रश्नाधिकार ३११

सायन राशियांलंका में उदयासुचरखंड असुओं मेंप्रयाग में उदयासु
कर्क१६३१+१११२०४२
सिंह१७६४+२७०२०६४
कन्या१६७५+३३३२००८
इसकी उपपत्ति यों है :—
क्रान्तिवृत्त के किसी बिन्दु का का विषुवांश जानने के लिए समीकरण (१) का प्रयोग किया जाता है जो यह है
ज्या (व पू) = (का के भोगांश की ज्या x परमक्रान्ति कोटिज्या) / (का की क्रान्ति कोटिज्या)
प्राचीन तथा अर्वाचीन दोनों रीतियों से यह सिद्ध है कि किसी कोण की ज्या उसके परिपूरक (Supplementary) कोण की ज्या के समान होती है [देखो पृष्ठ १२६-१२८] अर्थात् ज्या (क) = ज्या (१८०° - क) जहाँ क किसी कोण का मान है। इसलिए यह सिद्ध है कि
ज्या (व पू) = ज्या (१८०° - व पू)
और ज्या (काका भोगांश) = ज्या (१८०° - का का भोगांश)
इसलिए ज्या (१८०° - व पू)
= ज्या (१८०° - का का भोगांश) परम क्रान्ति कोटिज्या / का की क्रान्ति कोटिज्या (२)
ऊपर बतलाया गया है कि जब का का भोगांश अर्थात् व का ६०° होता है तब का का विषुवांश अर्थात् व पू ५७°४६' होता है, इसलिए समीकरण (२) के अनुसार जब का का भोगांश १८०° - ६०° = १२०° होगा तब इसका विषुवांश १८०° - ५७°४६' = १२२°११' होगा । इसका अर्थ यह हुआ कि जितने समय में वसंत संपात से क्रान्तिवृत्त का १२० अंश लंका में उदय होता है उतने समय में विषुवद्वृत्त का १२२°११' उदय होता है । परन्तु क्रान्तिवृत्त की पहिली तीन राशियां जितनी देर में उदय होती हैं उतनी देर में विषुवद्वृत्त का भी ६०° उदय होता है । इसलिए चौथी राशि जितने समय में उदय होती है उतने समय में विषुवद्-वृत्त का १२२°११' - ६०° = ३२°११' उदय होता है । परन्तु विषुवद्वृत्त का