सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३१३ व पू = व पू च — पू च परन्तु का बिन्दु की क्रान्ति सायन वृष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान अर्थात् २०°१०' है क्योंकि वसंत संपात बिन्दु से ६०° के भोगांश तक क्रान्ति जिस क्रम से बढ़ती है उसी क्रम से ६०° से १८०° तक के भोगांश तक वह घटती भी है अर्थात् सायन वृष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति सायन कर्क के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान होती है और सायन मेष के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति सायन सिंह के अन्तिम बिन्दु की क्रान्ति के समान होती है, इत्यादि । इसलिए पू च = १०°३' परन्तु व पू च = १२२°११' क्योंकि यह १२०° के भोगांश का विषुवांश है । इसलिए व पू = १२२°११' - १०°३' = ११२°८' = ६७२८' ∴ १२० भोगांश के उदयासु = ६७२८ परन्तु प्रथम तीन राशियों के उदयासु = ४६८६ ∴ कर्क राशि के उदयासु = ६७२८ - ४६८६ = २०४२ जो लंका में कर्क के उदयासुओं में १११ जोड़ने से आता है । इसी प्रकार यह भी सिद्ध किया जा सकता है कि १५० भोगांश अर्थात् मेष से सिंह ५ राशियों तक के उदयासु प्रयाग मे क्या होंगे । फिर प्रथम चार राशियों के उदयासु घटाने पर सिंह राशि के उदयासु निकल आवेंगे जो लंका में सिंह के उदयासुओं में २७० जोड़ने से भी प्राप्त सो सकते हैं । सायन कन्या राशि का अन्तिम बिन्दु जिसका भोगांश १८० है विषुवद्वृत्त से फिर मिल जाता है अर्थात् यही शरद संपात का स्थान है इसलिए यह वसंत संपात की तरह ठीक पूर्व में उदय होता है और इसका विषुवांश भी १८०° होता है । इसी प्रकार सायन मेष से सायन कन्या तक की प्रत्येक राशि के उदयासु लंका में तथा उत्तरी गोलार्द्ध के अन्य स्थानों में क्या होते हैं जाना जा सकता है । अब यह दिखलाना है कि सायन तुला से लेकर सायन मीन तक की प्रत्येक राशि के उदयासु क्या हैं । ४४वें श्लोक के उत्तरार्द्ध में इसके लिए बहुत ही सरल नियम यह दिया हुआ है कि मेष से कन्या तक के जो उदयासु हैं वही उलटे क्रम से तुला से मीन तक के उदयासु हैं अर्थात् कन्या के उदयासु तुला के उदयासु के समान हैं, सिंह के उदयासु वृश्चिक के समान हैं, इत्यादि ।