भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 340

• त्रिप्रश्नाधिकार ३१७ ऊपर की सारिणी से यह प्रकट होगा कि क्रान्तिवृत्त के १२ प्रधान बिन्दुओं के भोगांश, विषुवांश, क्रान्ति क्या हैं । इससे प्रकट है कि लंका में सायन मेष, वृष इत्यादि राशियों के जो उदयासु हैं उन्हीं को कला समझ कर जोड़ लेने से विषुवांश आते हैं । परन्तु यह ध्यान रहे कि यदि क्रान्तिवृत्त के किसी ऐसे बिन्दु का विषुवांश जानना है जो उपर्युक्त १२ प्रधान बिन्दुओं के सिवा अन्य बिन्दु हैं तो अनुपात की रीति से काम नहीं चलेगा, क्योंकि कुछ स्थूलता हो जाती है। इसके लिए सबसे अच्छी रीति यही है कि चित्र ५६ और समीकरण (१) की रीति से काम लिया जाय । अब तक जो कुछ लिखा गया है उससे सायन राशियों के उदयासु जाने जा सकते हैं परन्तु आजकल निरयन राशियों का भी प्रचार है जिनका आरम्भ मेष तथा अश्विनी के आदिविन्दु से होता है। यह बिन्दु विक्रम की ६ठीं शताब्दी में वसंत संपात का स्थान था (देखो ६-१० श्लोकों का विज्ञान भाष्य) । इसलिये आवश्यक है कि निरयन राशियों के उदयासु भी संक्षेप में बतला दिये जायें । यह बतलाया गया है कि सायन भोगांश से अयनांश घटा दिया जाय तो निरयन भोगांश आता है, परन्तु अयनांश प्रतिवर्ष ५८″.६६ के लगभग बढ़ता है (देखो पृष्ठ ५०) और १६८२ वि० की मेष संक्रान्ति के समय यह २२°४१′ के लगभग था (देखो पृष्ठ २५२) । सुविधा के लिये विकलाओं की गणना छोड़ दी गई है जिससे व्यवहार में बहुत कम अन्तर पड़ता है । अयनांश २२°४१′ मानने का अर्थ यह है कि जब सायन भोगांश २२°४१′ होता है तब निरयन भोगांश शून्य होता है अर्थात् तब निरयन मेष राशि का आरम्भ होता है, और जब सायन भोगांश ५२°४१′ होता है तब निरयन मेष राशि का अंत तथा निरयन वृष का आरम्भ होता है। इसी तरह मिथुन, कर्क इत्यादि निरयन राशियों का निश्चय कर लेना चाहिए । निरयन मेष राशि के उदयासु जानने के लिए यह देखना पड़ता है कि क्रान्तिवृत्त का वह भाग जो २२°४१′ और ५२°४१′ सायन भोगांशों के बीच में है कितने समय में उदय होता है। इसलिए पहले यह जानना आवश्यक है कि वसंत सम्पात और निरयन मेष के आदि बिन्दु के बीच का भाग कितने समय में उदय होता है । फिर यह जानना पड़ता है कि वसंत सम्पात और निरयन मेष के अन्तिम बिन्दु के बीच का भाग कितने समय में उदय होता है। दोनों का जो अंतर आता है वही निरयन मेष के उदयासु हैं। इसके लिए निरयन मेष के आदि और अन्तिम बिन्दु की क्रान्तियां भी जाननी पड़ती हैं ।