भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ३२३ चाहिये । शेष में से इससे आगे की राशि के उदयासुओं को घटाना चाहिये । इसी प्रकार आगे आने वाली राशियों के उदयासुओं को घटाते जाने से जब शेष इतना रह जाय कि फिर आगे की राशि के उदयासु न घटे तो यही अशुद्ध राशि (न घटने वाली राशि) कही जायगी । परन्तु यदि गतासु से लग्न जानना हो तो जो राशियां सूर्योदय के पहले उदय हो चुकी रहती हैं उनके उदयासुओं को सूर्योदय होने में जितना समय हो उसमें से उलटे क्रम से घटना चाहिये अर्थात् पहले तो गतासु घटावे, फिर सूर्य की राशि से जो राशि पीछे हो उसके उदयासुओं को घटाना चाहिये फिर उससे पीछे की राशि के उदयासुओं को घटाना चाहिये इत्यादि, (४७) अंत में यदि कुछ शेष रह जाय तो उसको ३० से गुणा करके अशुद्ध राशि के उदयासुओं से भाग देना चाहिये । यदि क्रिया गतासु से की गयी हो तो भागफल को अशुद्ध राशि से घटाने पर और यदि यह क्रिया भोग्यासु से की गयी हो तो भागफल को जोड़ने से यह ज्ञात हो जाता है कि उस समय क्षितिज में क्रान्तिवृत्त का कौन विन्दु लग्न है । विज्ञान भाष्य —४७वें श्लोक के उत्तरार्द्ध का अर्थ करने में कई टीकाकारों ने अयनांश के जोड़ने-घटाने की भी चर्चा की है जो मेरी समझ में व्यर्थ है क्योंकि जब स्पष्ट सूर्य की राशि से लग्न जाना जाता है और सभी ग्रहों का स्पष्ट निरयन राशियों में किया जाता है तब सायन सूर्य से लग्न जानने की क्या आवश्यकता है । इसके अर्थ में भ्रम इसलिए होता है कि इन तीन श्लोकों में लग्न निकालने की दो रीतियां जो प्रायः एक ही सी हैं दी हुई हैं । यदि सूर्योदय से इष्टकाल तक का समय ३० घड़ी से कम हो तो भोग्यासुओं से काम लेना सुगम होगा और यदि इष्ट काल अगले सूर्योदय के निकट हो तो अगले सूर्योदय के गतासुओं से काम लेने में सुविधा होगी । इसीलिए अन्तिम लब्धि के जोड़ने घटाने की आवश्यकता पड़ती है । यह बात नीचे के २ उदाहरणों से स्पष्ट हो जायगी । उदाहरण १.—सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल और ५२ घड़ी १० पल पर कौन-कौन लग्न होंगे जब कि सूर्योदय काल में सूर्य का निरयन भोगांश ३रा ५° १' ६" और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति ५७' २१" है । विकलाओं की गणना करने में गुणा भाग बहुत करना पड़ेगा इसलिए आगे चलकर सूर्य का निरयन भोगांश केवल कलाओं तक लिया जायगा । १ली रीति— पहिले यह जानना चाहिए कि सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल पर सूर्य का निरयन भोगांश क्या होगा ।