सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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अनुवाद—(८) पूर्व या पश्चिम नतकाल, तात्कालिक सूर्य और लंका के उदयासुओं से तात्कालिक सूर्य और यामोत्तर वृत्त के बीच के क्रान्तिवृत्त के खंड को जान लो। पूर्व नतकाल हो तो इसको तात्कालिक सूर्य से घटा दो अन्यथा जोड़ दो तो मध्य लग्न ज्ञात हो जायगा ।
विज्ञान भाष्य—क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु यामोत्तरवृत्त पर होता है वही मध्यलग्न या दशमलग्न (Culminating point) कहलाता है। क्रान्तिवृत्त का जो विन्दु खस्वस्तिक से अत्यन्त निकट रहता है उसे विक्षेभ लग्न कहते हैं। उदयलग्न में ३ राशि घटाने से अथवा अस्तलग्न में तीन राशि जोड़ने से विक्षेभ लग्न ज्ञात होता है।
लंका में राशियों के उदय होने में जितना समय लगता है उतना ही समय उनके याम्योत्तरवृत्त के उल्लंघन करने में भी लगता है। यह सब स्थानों के लिए वही होता है। जैसे निरयन मेष राशि का उदयांश लंका में २६°१८′ है। इसलिए लंका में मेष के उदयासु १७५८ हुए। इतने ही समय में मेषराशि सब स्थानों में यामोत्तरवृत्त का उल्लंघन करता है। इसी तरह अन्य राशियों के बारे में समझना चाहिए।
इसका कारण यह है कि लंका में किसी राशि का उदयांश विषुवद्वृत्त का वह खंड है जिसके उदय होने में उतना ही समय लगता है जितने समय में वह राशि क्षितिज के ऊपर आती है। विषुवद्वृत्त के इस खंड को यामोत्तर उल्लंघन करने में भी इतना ही समय लगता है। इसलिए यह राशि यामोत्तर के उल्लंघन करने में भी इतना ही समय लेगी।
उदाहरण २.—सूर्योदय से १६ घड़ी १५ पल और ५२ घड़ी १० पल उपरान्त कौन-कौन मध्यलग्न होंगे जब कि सूर्योदयकाल में सूर्य का निरयन भोगांश ३रा५°१′६″ और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति ५७′२१″ है ?
प्रथम खण्ड— पहले यह जानना होगा कि सूर्योदयकाल से १६ घड़ी १५ पल पर नतकाल क्या है अर्थात् इस समय के कितना पीछे या पहले ठीक मध्याह्न होगा । इसलिए यह जानना आवश्यक है कि सूर्योदय से कितनी घड़ी, पल पर मध्याह्न होगा । इसके लिए चरप्राण की गणना करनी होगी। परन्तु चरज्या सूर्य की क्रान्ति और स्थान के अक्षांश पर अवलम्बित है। इसलिए पहले यही जानना चाहिए कि सूर्योदय काल के सूर्य की क्रान्ति क्या है।