भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ३२६ अलग-अलग जाने जायें। परन्तु यह काम कष्टप्रद है इसलिए यदि प्रत्येक अंश का उदयकाल समान समझकर अनुपात से काम लिया जाय जैसा कि सब करते हैं तो लग्न की राशि में कोई अन्तर नहीं पड़ेगा हाँ राशि के उदय-बिंदु के निश्चय करने में तनिक सा अन्तर पड़ जायगा । इसलिए यदि लग्न का नवांश या द्वादशांश शुद्धता- पूर्वक जानना हो तो सायन सूर्य से ही पूर्ववत् काम लेना चाहिए । ऐसी दशा में अयनांश का संस्कार करने पर निरयन लग्न का ज्ञान होगा । मध्य लग्न जानने की रीति— प्राक्पश्चान्नतनाडोभिः तस्माल्लंकोदयासुभिः । भानौक्षयधने कृत्वा मध्यलग्नं तथाभवेत् ॥४८॥ चित्र ६३ उ, प, द, पू=प्रयाग के क्षितिजवृत्त के उत्तर, पच्छिम, दक्षिण और पूर्व बिन्दु । क व का=क्रान्तिवृत्त । उ ध ख म द=यामोत्तरवृत्त । का =उदय लग्न । क=अस्त लग्न । म=मध्य या दशमलग्न । व=वसन्त सम्पात । वि = वित्रिभ लग्न । ख = खस्वस्तिक ।