सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३३७ है। इसलिए बहुत सूक्ष्म गणना के लिए उदयकाल से समय की परीक्षा नहीं की जाती वरन् मध्यान्ह काल से की जाती है। इसलिए सावन या नाक्षत्र दिन की परिभाषा आजकल यों की जाती है :— सूर्य का केन्द्र जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण से लेकर फिर उसका केन्द्र जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण तक के समय को 'स्पष्ट सावन दिन' कहते हैं। वसंत सम्पात बिन्दु जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण से लेकर फिर यह बिन्दु जिस क्षण यामोत्तर वृत्त पर आता है उस क्षण तक के समय को 'नाक्षत्र दिन' कहते हैं। वसंत सम्पात बिन्दु की गति प्रायः समान होती है। इसलिए नाक्षत्र दिन सदा समान* होता है। परन्तु सावन दिन के परिमाण में बहुत भेद पड़ जाता है क्योंकि सूर्य की दैनिक गति निरंतर बदला करती है। इसका पता नाक्षत्र काल सूचित करने वाली घड़ियों से सहज ही लग सकता है। यदि घड़ी ऐसी बनायी जाय कि वसंत सम्पात बिन्दु के यामोत्तर वृत्त पर आने के समय उसमें ठीक १२ बजा करे तो ऐसी घड़ी को नाक्षत्र घड़ी (घटिका यंत्र) कहते हैं। इस तरह के घटिका यंत्र से सहज ही जाना जा सकता है कि सावन दिनों के परिमाणों में कितना अन्तर हो जाता है। उदाहरण के लिए '१८६६ ई० के चार सावन दिनों के† परिमाण दिये जाते हैं :— १८०६ ई० (नाक्षत्रकाल) घंटा मिनट सेकंड १ली जनवरी के स्पष्ट मध्याह्न से २री जनवरी के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ४ २४.६ २री अप्रैल के स्पष्ट मध्याह्न से ३री अप्रैल के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ३ ३८.५ ३री जुलाई के स्पष्ट मध्याह्न से ४थी जुलाई के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ४ ७.५ २री अक्टूबर के स्पष्ट मध्याह्न से ३री अक्टूबर के स्पष्ट मध्याह्न तक का समय २४ ३ ३७.६
- अक्ष विचलन के कारण वसन्त सम्पात का स्पष्ट स्थान से पूर्व मध्यम स्थान या पच्छिम हो जाता है (देखो पृष्ठ २४७) । परन्तु इससे नाक्षत्र दिन के परिमाण में इतना कम अन्तर पड़ता है कि उसको नहीं के समान समझ लेने में कोई हानि नहीं होती । †Ball's Spherical Astronomy पृष्ठ २१५ २२