सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 364, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार २४१ तब तक स्पष्ट सूर्य का ध्रुवप्रोतवृत्त कल्पित सूर्य से पूर्व की ओर रहता है। क्योंकि स्पष्ट सूर्य का विषुवांश कल्पित सूर्य के विषुवांश से जो स्पष्ट सूर्य के मध्यम भोगांश के समान होता है अधिक होगा (देखो ३२० पृष्ठ की सारिणी)। ऐसी दशा में स्पष्ट सूर्य कल्पित सूर्य से पीछे यामोत्तरोल्लंघन करेगा अर्थात् धूपघड़ी मध्यम घड़ी से पीछे (मन्द या सुस्त) रहेगी। इसलिए धूपघड़ी के समय में दोनों के विषुवांशों का अन्तर जोड़ने पर यांत्रिक घड़ी (मध्यम घड़ी) का समय ज्ञात होगा। इसी प्रकार जब स्पष्ट सूर्य सायन तुलादि तीन राशियों में होगा तब धूपघड़ी मध्यम घड़ी से आगे रहेगी और धूपघड़ी के समय से स्पष्ट सूर्य और कल्पित सूर्य के विषुवांशों का अन्तर घटाने पर मध्यम घड़ी का समय ज्ञात होगा और जब स्पष्ट सूर्य सायन मकरादि तीन राशियों में रहेगा तब धूपघड़ी के समय में दोनों के विषुवांशों का अन्तर जोड़ने पर मध्यम समय ज्ञात होगा। परन्तु स्पष्ट सूर्य क्रान्तिवृत्त पर सदा समान गति से नहीं चलता। कभी इसकी गति तीव्र हो जाती है और कभी मन्द। इसलिए इसके कारण भी स्पष्ट सूर्य यामोत्तर वृत्त पर उस समय नहीं आवेगा जिस समय मध्यम सूर्य आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है। स्पष्ट सूर्य और मध्यम सूर्य क्रान्तिवृत्त के केवल मन्दोच्च और नीच स्थानों पर साथ रहते हैं (देखो पृष्ठ ८०-८२)। जब सूर्य मन्दोच्च से आगे बढ़ता है तब स्पष्ट सूर्य की दैनिक गति मध्यम सूर्य की दैनिक गति से कम होने के कारण स्पष्ट सूर्य मध्यम सूर्य से पीछे पड़ जाता है अर्थात् मध्यम सूर्य से स्पष्ट सूर्य पूर्व की ओर बढ़ा रहता है इसलिए स्पष्ट सूर्य मध्यम सूर्य से पहले यामोत्तर वृत्त पर आता है अर्थात् स्पष्ट मध्यान्ह मध्यम मध्यान्ह से पहले होता है। इस कारण भी धूप- घड़ी का समय मध्यम काल से आगे रहता है। यह दशा तब तक रहती है जब तक सूर्य नीच पर नहीं पहुँच जाता है। यहाँ से आगे बढ़ने पर स्पष्ट सूर्य की गति मध्यम गति से अधिक होती है इसलिये स्पष्ट सूर्य मध्यम सूर्य से आगे पूर्व की ओर रहता है। इसलिए स्पष्ट मध्यान्ह मध्यम मध्यान्ह से पीछे होता है अर्थात् धूपघड़ी मध्यम घड़ी से सुस्त रहती है। इन दोनों कारणों से अर्थात् सूर्य के क्रान्तिवृत्त पर चलने तथा दैनिक गति के समान न होने से स्पष्ट काल और मध्यम काल में कुछ अन्तर होता है। स्पष्ट काल में जितना समय घटाने या जोड़ने से मध्यम काल ज्ञात होता है उसी को 'काल समीकरण' कहते हैं। इसको यों भी लिखते हैं :— मध्यमकाल = स्पष्टकाल +– काल समीकरण*
- वेंकटेश वापू केतकर ने अपने ज्योतिर्गणित में इसका नाम उदयान्तर रखा है (ज्यो० ग० पृष्ठ ७५)