भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 366

त्रिप्रश्नाधिकार ३४३ व - भ का मान कलाओं में तथा असुओं में ज्ञात हो जायगा । इस सूत्र से हम सूर्य के किसी सायन भोगांश का विषुवांश सहज ही जान सकते हैं । यह बतलाया गया है (देखो पृष्ठ ३०६) कि सूर्य की परम क्रान्ति विक्रम की २१वीं शताब्दी के प्रथमार्द्ध तक २३°२७' मान लेने में कुछ हानि नहीं है इसलिए स्परे² $\frac{क}{२}$ = स्परे $\frac{२३^\circ२७'}{२}$ = स्परे² ११°४३'.५ = (·२०७५)² = ·०४३०५ स्परे⁴ $\frac{क}{२}$ = (·०४३०५)² = ·००१८६५ स्परे⁶ $\frac{क}{२}$ = ·००१८६५ $\times$ ·०४३०५ = ·००००८ इसलिए समीकरण (२) के दाहिने पक्ष को ३४३७.७५ से गुणा करने तथा स्परे² $\frac{क}{२}$, स्परे⁴ $\frac{क}{२}$, इत्यादि के मान उत्थापन करने पर इसका रूप यह हो जायगा — व - भ = १४७'.६६१ ज्या २ भ + ३'.१८ ज्या ४ भ - ०'.०६ ज्या ६ भ + $\cdots$ (३) इस समीकरण के दाहिने पक्ष के पद इतनी शीघ्रता से छोटे हो रहे हैं कि तीसरे पद के आगे आनेवाले पदों को छोड़ देने से कुछ भी हानि नहीं हो सकती । यदि तीसरा पद भी छोड़ दिया जाय तो भी विशेष हानि नहीं । इस प्रकार स्पष्ट भोगांश और उसके विषुवांश का अन्तर कलाओं या असुओं में सहज ही जाना जा सकता है जिससे विषुवांश और भोगांश की सारिणी ३२० पृष्ठ की सारिणी की तरह सहज ही बनायी जा सकती है । अब इस सूत्र की सहायता से कल्पित सूर्य के मध्यम विषुवांश और स्पष्ट सूर्य के विषुवांश का सम्बन्ध भी जानना आवश्यक है क्योंकि काल समीकरण तो स्पष्ट सूर्य के विषुवांश और कल्पित सूर्य के विषुवांश का अन्तर है । परन्तु कल्पित सूर्य का विषुवांश सूर्य के मध्यम भोगांश के समान होता है । इसलिए समीकरण (२) और पृष्ठ १७८ के समीकरण (ऊ) से यह काम सहज ही निकल सकता है । पृष्ठ १७८ के समीकरण (छ) का नीचे लिखा संक्षिप्त रूप पर्याप्त होगा — स = म + २ च ज्या म + $\frac{५}{४}$ च² ज्या २ म यहाँ स = स्पष्ट मन्द केन्द्र, म = मध्यम मन्द केन्द्र और च = पृथ्वी की केन्द्र च्युति जो $\frac{१^\circ}{५६७०}$ के समान है ।