भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

३४४ सूर्य-सिद्धान्त नीच (Perigee) से ग्रह के अन्तर को मन्द केन्द्र कहते हैं (देखो पृष्ठ १६२) । इसलिए यदि मन्द केन्द्र में नीच का भोगांश जोड़ दिया जाय तो ग्रह का भोगांश आ जायगा । यदि पृथ्वी के नीच का भोगांश नी मान लिया जाय तो स्पष्ट भोगांश = स + नी और मध्यम भोगांश = म + नी स्पष्ट भोगांश को भ माना गया है इसलिए मध्यम भोगांश को भा मान लेना उचित होगा । इसलिए भ = स + नी अथवा स = भ - नी भा = म + नी अथवा म = भा - नी स और म के इन मानों को समीकरण (छ) के संक्षिप्त रूप में उत्थापित करने से भ - नी = भा - नी + २ च ज्या (भा - नी) + ५/६ च^२ ज्या २ (भा - नी) अथवा भ = भा + २ च ज्या (भा - नी) + ५/६ च^२ ज्या २ (भा - नी) (४) समीकरण (२) और (४) की सहायता से एक ऐसा समीकरण ज्ञात हो सकता है जिसमें भ न रहे । ऐसे समीकरण से स्पष्ट विषुवांश और मध्यम भोगांश अथवा कल्पित सूर्य के विषुवांश का सम्बन्ध सहज ही जाना जा सकता है। यह प्रकट है कि उपर्युक्त दोनों समीकरणों के योग से ऐसे पद भी प्राप्त होंगे जिनके गुणक बहुत छोटे हों और जिनके रखने से प्राप्त समीकरण का रूप बहुत बढ़ जायगा परन्तु उससे अधिक लाभ नहीं होगा । इसलिए जिन पदों के गुणक ०००१ से कम होंगे उनको छोड़ दिया जायगा । समीकरण (२) के भ की जगह समीकरण (४) का दाहिना पक्ष उत्थापित करने से और ऐसे पदों को छोड़ देने से जिनके गुणक .०००१ से कम हों, हमें नीचे लिखा समीकरण प्राप्त होगा । व = भा + २ च ज्या (भ - नी) + ५/४ च^२ ज्या २ (भा - नी)

  • स्परे^२ क/२ ज्या २ [भ + २ चज्या (भा - नी) + ५/६ च^२ ज्या २ (भा - नी)]
  • १/२ स्परे^४ क/२ ज्या ४ [भा + २ चज्या (भा - नी) + ५/४ च^२ ज्या २ (भा - नी)] यहाँ ५/६ च^२ ज्या २ [भा - नी) भी बहुत छोटा है इसलिए चौथे और पांचवें पदों में इसको भी छोड़ देने पर यह पद क्रमानुसार नीचे के रूप के हो जायेंगे ।
  • स्परे^२ क/२ ज्या [२ भा + ४ च ज्या (भा - नी)] और