भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ३४६ — १४८'·० ज्या (२ × ३००°५०'३३") = २३'·१७ (— ज्या ५६°६'२७")

  • ११२'·८३ (कोज्या ५६°६'२७") — १४८' ज्या ६०१°४१'६"* = — २३'·१७ × ·८५८६
  • ११२'·८३ × ·५१२६ — १४८' (— ·८८०४) = — १६'·८६ + ५७'·८४ + १३०'·३० = + १६८'·२५ = + १६८·२५ असु = + २८ पल यदि अधिक शुद्धता की आवश्यकता हो तो समीकरण (६) की सहायता से काल समीकरण का मान जानना चाहिए। यह भी ध्यान रहे कि सूर्य का जो मध्यम स्थान ऊपर लिया गया है वह सूर्य-सिद्धान्त की रीति से जाना गया है। यदि शुद्ध वेध से सूर्य का मध्यम सायन भोगांश निकाला† .जाय तो ३०१°५'२" होता है। इसलिए यदि समीकरण (६) तथा वेधसिद्ध मध्यम सायन भोगांश से काल समीकरण निकाला जाय तो नाटिकल अलमैनेक में दिए हुए काल समीकरण के समान होगा। काल समीकरण प्रकट करने का वक्र (curve) असुओं में काल समीकरण का रूप सूत्र (७) में यह है ३४३७.७५ { २ च ज्या (भा — नी) — स्परे२ क/२ ज्या २ भा }
  • ६०१°४१'६" = ३६०° + २४१°४१'६' = ३६०° + १८०° + ६१°४१'६" ∴ ज्या ६०१°४१'६" = ज्या (१८०° + ६१°४१'६") = — ज्या ६१°४१'६" † इसकी रीति यह है :— १८७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में १६२२ के नाटिकल अलमैनेक के अनुसार सूर्य का मध्यम सायन भोगांश २०°४४'५८" था। मेष सक्रान्ति से वसन्त पंचमी की अर्द्धरात्रि तक २८४.४१६७ मध्यम सावन दिन होते हैं और सूर्य के मध्यम सायन भोगांश की गति प्रतिदिन ०°.९८५६४७३१५३६ होती है। इनको गुणा कर देने से २८०°.३३४५६२५ अथवा २८०°२०' ४"·४ आता है। इसको मेष संक्रान्ति काल के सायन मोगांश में जोड़ देने से ३०१°५'२"·४ हुआ।