भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

३६० सूर्य-सिद्धान्त पदार्थ में जाता है तब उसकी दिशा वही नहीं रहती जो पहले पारदर्शक पदार्थ में होती है। इस घटना को किरण का वर्तन या केवल वर्तन कहते हैं। इसको कुछ लेखकों ने किरणवक्रौभवन का नाम दिया है परन्तु कई बातों की सुविधा के विचार से इसको वर्तन कहना अच्छा जान पड़ता है। इससे किसी वस्तु के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में बड़ा अन्तर देख पड़ता है। कभी-कभी वस्तुएँ विचित्र रूप धारण कर लेती हैं। परन्तु इन सब घटनाओं की चर्चा करने के लिए यह स्थान उचित नहीं है। यहाँ केवल उतना ही बतलाया जायगा जितना ज्योतिष से सम्बन्ध रखता है। अनुभव के लिए एक छोटा सा उदाहरण देना पर्याप्त होगा :- चित्र ६५ पानी भरा हुआ गिलास धूप में रख दो और देखो कि गिलास का कितना भाग धूप से प्रकाशित होता है। पानी गिरा कर गिलास को फिर उसी जगह रख दो। इस बार गिलास का कुछ कम भाग प्रकाशित होगा। चित्र ६५ में ग गा एक गिलास है। यदि पानी भर कर यह धूप में रखा जाय तो ग से भ तक प्रकाशित देख पड़ता है अर्थात् यह देख पड़ता है कि धूप गिलास के पेंदे के किनारे तक भी पहुँचती है। परन्तु पानी गिरा कर गिलास को फिर वहीं रख देने पर देख पड़ता है कि अब गिलास का केवल ग ख भाग प्रकाशित रहता है, पेंदे तक धूप जाती ही नहीं। इससे यह प्रकट होता है कि हवा में यदि किरण स गा ख दिशा में होती है तो पानी में घुसने ही यह गा भ दिशा में हो जाती है।