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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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१६ सूर्य सिद्धान्त चित्र १ कहा गया है कि शीघ्र चलनेवाले ग्रह थोड़े काल में तथा मंद चलने वाले ग्रह अधिक काल में चक्कर पूरा करते हैं। यहाँ कुछ विरोध जान पड़ता है, परन्तु यह विरोध नहीं है; क्योंकि पहले श्लोक में जो समान गति बतलायी गई है वह योजनात्मक गति है और इस श्लोक में गति का मान कोणात्मक (Angular velocity) है। एक चक्कर ३६० अंशों का होता है; इसलिए बाहरी वृत्त का एक इंच, केन्द्र पर ३६०°/१५ = २४° का कोण बनाता है और भीतरी वृत्त का एक इंच ३६०°/१० = ३६° का कोण बनाता है। इसलिए यद्यपि चींटियों की रेखात्मक (rectilinear) गति १ इंच प्रति सेकंड होने से समान है यद्यपि इनकी कोणात्मक गति प्रति सेकंड भिन्न है। बाहरी चींटी प्रति सेकंड २४° तथा भीतरी ३६° चलती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि शीघ्र चलनेवाली कम समय में तथा मंद चलनेवाली अधिक समय में चक्कर पूरा करेगी। २७वें श्लोक में भगण की परिभाषा भी दी गयी है। रेवती नक्षत्र के अंत से आरम्भ करके पूरब की ओर बढ़ता हुआ जब ग्रह एक चक्कर लगाकर फिर वहीं रेवती के अंत में आ जाता है तब वह एक भगण (नक्षत्र गण जो २७ हैं) पूरा करता है। इसलिए भगण को चक्कर भी कहते हैं।