सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार १५ दूसरे आर्यभट का भी यही मत है; परन्तु ब्रह्मगुप्त भास्कराचार्य इत्यादि के गणित से जान पड़ता है कि इनको यह मत मान्य नहीं था, क्योंकि इन्होंने ग्रहों का स्थान जानने के लिए कल्प के आदि से गणना की है; परन्तु सूर्य सिद्धान्त ने सृष्टि के तैयार होने में जितना समय लगा है उसको ग्रह गणित में छोड़ दिया है। पश्चाद्व्रजन्तोऽतिजवान्नक्षत्रैस्ससतं ग्रहाः । नीयमानाश्च लम्बन्ते तुल्यमेव स्वमार्गगाः ॥२५॥ प्राग्गतित्वमतस्तेषां भगणैः प्रत्यहं गतिः । परिणाहवशाद्भिन्नाः तद्वशाद्भानि भुञ्जते ॥२६॥ शीघ्रगस्त्वर्क्षमल्पेन कालेन महताऽल्पगः । तेषां तु परिवर्तेन पौष्णान्ते भगणास्स्मृतः ॥२७॥ अनुवाद—(२५) शीघ्रगामी नक्षत्रों के साथ सदैव पश्चिम की ओर चलते हुए ग्रह अपनी-अपनी कक्षा में समान परिमाण में हारकर पीछे रह जाते हैं; (२६) इसलिए वह पूर्व की ओर चलते हुए देख पड़ते हैं और कक्षाओं की परिधि के अनुसार उनकी दैनिक गति भी भिन्न देख पड़ती है; इसलिए नक्षत्र चक्र को भी यह भिन्न समय में अर्थात् (२७) शीघ्र चलनेवाले थोड़े समय में और कम चलने वाले बहुत समय में पूरा करते हैं। रेवती के अंत में पूरे होनेवाले चक्र को भगण कहते हैं ॥२५-२७॥ विज्ञान भाष्य—इन तीन श्लोकों में ग्रहों की गति का सिद्धान्त बतलाया गया है; इसलिए यह बड़े महत्व के श्लोक हैं। इनसे संक्षेप में यह पता चलता है कि भारत के प्राचीन ज्योतिषी ग्रहों के बारे में क्या विचार रखते थे। २५वें श्लोक में बतलाया गया है कि आकाश में जितने तारे देख पड़ते हैं वह सब ग्रहों के साथ पश्चिम की ओर जा रहे हैं; परन्तु नक्षत्रों के बहुत शीघ्र चलने के कारण ग्रह पीछे रह जाते हैं और इसीसे पूर्व की ओर चलते हुए देख पड़ते हैं। इनकी पूरब की ओर बढ़ने की चाल तो समान है, परन्तु इनकी कक्षाओं का विस्तार भिन्न होने से इनकी गति भी भिन्न देख पड़ती है। इसका रहस्य आगे के चित्र से प्रकट होगा — मान लीजिये कि दिये हुए चित्र में भीतरी वृत्त १० इंच का और बाहरी १५ इंच का है और मान लीजिये कि ख और ग स्थानों से, जो क केन्द्र की सीध में हैं दो चींटियां १ इंच प्रति सेकंड की चाल से भीतरी और बाहरी वृत्त की परिक्रमा करने को चलती हैं; तो यह स्पष्ट है कि बाहरी वृत्त पर चलनेवाली चींटी एक परिक्रमा १५ सेकंड में और भीतरी वृत्त पर चलने वाली चींटी एक परिक्रमा १० सेकंड में कर डालेगी। इससे यह सिद्ध हुआ कि समान रेखात्मक गति से चलने पर भिन्न-भिन्न आकार की कक्षा का चक्कर भिन्न-भिन्न समय में होगा । परन्तु २७वें श्लोक में