भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 838 में से

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विप्रश्नाधिकार ३७३ =(घ - १) स्परे न (१ - छ × छे² न) =(घ - १) स्परे न {१ - छ (१ + स्परे² न)} =(घ - १) स्परे न {१ - छ - छ स्परे² न} =(घ - १) (१ - छ) स्परे न - छ (घ - १) स्परे³ न =प स्परे न + फ स्परे³ न (२) यह पहले ही रूप का है। यहाँ प=(घ - १) (१ - छ) और फ=-छ (घ - १) इस सूत्र का प्रयोग व्यवहार में उसी समय हो सकता है जब प और फ के मान ज्ञात हों। इनका ज्ञान प्रत्यक्ष वेध से हो सकता है जिसकी चर्चा आगे की जायगी। मान लो* यह पाया गया है कि ५०° फारनहैट के तापक्रम पर जबकि वायु का दबाव ३० इंच ऊँचे पारे के दबाव के समान है ५४° और ७४° नतांशों के वर्तन क्रमशः ८०″·०६ और २००″·४६ हैं। उपर्युक्त सूत्र के अनुसार दो समीकरण यह हुए ८०″·०६=प (स्परे ५४°)+फ (स्परे ५४°)³ २००″·४६=प (स्परे ७४°)+फ (स्परे ७४°)³ इन समीकरणों से प और फ के मान क्रमशः ५८″·२६४ और ०″·०६६८२ आते हैं। इसलिए ५० फा० और ३० इंच के दबाव पर वर्तन का साधारण सूत्र यह होता है व = ५८″·२६३ स्परे न - ०″·०६६८२ स्परे³ न (३) यह भी प्रकट है कि फ/प = १/८७३, इसलिए जब तक स्परे³ न बहुत बड़ा न हो अर्थात् यदि सूर्य, या, तारा क्षितिज के पास न हो तब तक दूसरा पद भी छोड़ देने से कोई हानि नहीं हो सकती । यदि नतांश ७०° से अधिक न हो और तापक्रम में भी बहुत अन्तर न हो तो वर्तन का मान जानने के लिए नीचे लिखे सरल पद का प्रयोग उचित होगा । क स्परे न जहाँ क के लिए ५८″·२ लेना अधिक शुद्ध होगा। इस क को वर्तन का गुणक (Coefficient of refraction) कहते हैं। वायुमंडल का वर्तनांक ०°श तापक्रम और ७६० मि०मी० दबाव पर १·०००२६४ है (देखो Ball's Spherical Astronomy page 117) और कैसिनी

  • Ball's Spherical Astronomy पृष्ठ १२७
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