सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३७७ तीसरी रीति—इस रीति में उत्तर और दखिन की दो वेधशालाओं से यामोत्तर वृत्त पर स्थित उसी तारे के स्पष्ट नतांश जानकर वर्तन के गुणक स्थिर किये जाते हैं। ग वेधशाला से त तारे का दक्षिण नतांश ख त और उ वेधशाला से त तारे का उत्तर नतांश खा त हैं । ख त = ख व - व त = अ - क खा त = खा व + व त = आ + क जब कि अ, आ दोनों वेधशालाओं के अक्षांश और क तारे की क्रान्ति हैं । यदि ग और उ से त के स्पष्ट नतांश न और ना हों तो ख त = न + प स्परे न + फ स्परे³ न और खा त = ना + प स्परे ना + फ स्परे³ ना ∴ न + प स्परे न + फ स्परे³ न + ना + प स्परे ना + फ स्परे³ ना = ख त + खा त = अ + आ यदि फ स्परे³ न और फ स्परे³ ना को अत्यन्त छोटे होने के कारण छोड़ दिया जाय तो न + प स्परे न + ना + प स्परे ना = अ + आ इसमें न, ना, अ और आ के मान वेध से जानकर उत्थापित करने से प का मान जाना जा सकता है। यदि फ का मान भी जानना हो तो एक और तारे के स्पष्ट नतांश जानने की आवश्यकता पड़ेगी । उदाहरण के लिए अन्तरमदा पुञ्ज के ख तारे (β Andromeda) के नतांश ग्रीनविच और उत्तमाशा अन्तरीप (Cape of Good Hope) की वेधशालाओं से जिनके अक्षांश क्रमशः ५१° २८' ३८'' उत्तर और ३३°५६'४'' दक्षिण हैं लिये जाते हैं। पहली वेधशाला से तारे का स्पष्ट दक्षिण नतांश जब वह यामोत्तर वृत्त पर था १६°२०' ३'' और दूसरी वेधशाला से उसी तारे का स्पष्ट उत्तर नतांश ६६°१'५०'' था । इसलिए १६°२०'३'' + प स्परे १६°२०'३'' + ६६° १'५०'' + प स्परे ६६°१'५०'' = ५१°२८'३८'' + ३३°५६'४'' = ८५°२४'४२'' ∴ प (स्परे १६°२०'३'' + स्परे ६६°१'५०'') = ८५°२४'४२'' - ८५°२१'५३'' = २'४६'' या प (.२६३० + २.६०६३) = २'४६'' = १६६''