भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

३८२ सूर्य-सिद्धान्त ∵ उदयकालिक नतकाल = १५ + २ = १७ घड़ी ∵ कर्क संक्रान्ति के दिन काशी में महत्तम दिनमान = ३४ घड़ी इससे प्रकट होता है कि काशी का अक्षांश २५° से कुछ अधिक माना गया होगा क्योंकि तभी चरकाल २ घड़ी २.५ पल हो सकता है । इससे यह भी अनुमान होता है कि ब्रह्मगुप्त के समय से लेकर गणेश दैवज्ञ के समय तक सभी आचार्य सूर्य की परमक्रान्ति २४° इसीलिए मानते आये कि महत्तम दिनमान उनके वेध से उतना ही आता रहा जितना २४° की चरम क्रान्ति मानने से आता है क्योंकि उनको यह नहीं ज्ञात था कि वातावरण के कारण स्पष्ट दिनमान यथार्थ दिनमान से १४, १५ पल के लगभग बढ़ जाता है । वर्तन का विचार करने से महत्तम दिनमान आजकल ३४ घड़ी १० पल होता है । यह ३४ घड़ी ५ पल से केवल ५ पल अधिक है । इतनी अशुद्धि उदय और अस्तकाल के वेध के लिए अधिक नहीं कही जा सकती । वर्तन के कारण सूर्य के आकार में भेद-उदय अस्त होते हुए सूर्य का आकार बड़ा और कुछ अंडाकार देख पड़ता है। इसका कारण यही है कि क्षितिज के पास वर्तन की वृद्धि बहुत तीव्र होती है। सूर्य का विम्ब ३२ कला के लगभग होता है। इसलिए जिस समय सूर्य के विम्ब का सबसे नीचे वाला विन्दु क्षितिज में लगा रहता है उसका स्पष्ट नतांश ६०° रहता है और विम्ब के सबसे ऊपर वाले विन्दु का नतांश ३२ कला के लगभग कम रहता है। इस भिन्नता के कारण नीचेवाला विन्दु अधिक उठा हुआ रहता है और ऊपर वाला विन्दु उससे कम । इससे विम्ब का ऊर्ध्वव्यास कोई ५ कला कम देख पड़ने से सूर्य अंडाकार देख पड़ता है । वर्तन की और अधिक मीमांसा करने से विस्तार बहुत बढ़ जायगा । यदि यह जानना हो कि सूर्य का ऊपरी विम्ब क्षितिज पर कब आता है तो पृष्ठ ३७६ के समीकरण (२) में ता (न) की जगह ३५' + सूर्य के अर्द्धव्यास अथवा ३५' + १६' उत्थापन करने से जितना आवे उसे गणित सिद्ध नतकाल में जोड़ देना चाहिए । चन्द्रमा का उदयकाल जानने के लिए एक संस्कार और करना पड़ता है जिसे लम्बन संस्कार कहते हैं। इसलिए आगे लम्बन (parallax) की व्याख्या की जायगी । लंबन * स्पष्टाधिकार में बतलाई गयी नयी रीतियों से भी सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के जो स्थान ज्ञात होते हैं वह भूकेन्द्र से ठीक वैसे ही देखे जा सकते हैं । परन्तु भूतल के *इस खंड के लिखने में Loomis की Practical Astronomy से बहुत सहायता ली गई है ।