सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 407, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें३८४ सूर्य-सिद्धान्त कारण चन्द्रमा यथार्थ स्थान से कुछ लटका हुआ देख पड़ता है। इसीलिए इस परिवर्तन का नाम लम्बन पड़ा। इस लम्बन का प्रभाव चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों के भोगांश, शर, विषुवांश, क्रान्ति, इत्यादि पर भी पड़ता है जिसकी व्याख्या आगे की जायगी। मान लो कि त्र = भ द, पृथ्वी की त्रिज्या; क = भ च, भूकेन्द्र से चन्द्रमा की दूरी; न = ∠ ख भ च, चन्द्रमा का यथार्थ नतांश; ना = ∠ ख द च, चन्द्रमा का स्पष्ट नतांश; जा = ∠ भ च द, चन्द्रमा का नतांश सम्बन्धी लम्बन; त्रिभुज द भ च में भ द भ च ————————— = ————————— ज्या भ च द ज्या भ द च परन्तु ∠ भ द च और ∠ ख द च का योग १८०° होता है इसलिए ज्या भ द च = ज्या ख द च । इनकी जगह ऊपर लिखे संकेत के अक्षर उत्थापित करने से सिद्ध होता है की त्र क —————— = —————— ज्या ला ज्या ना त्र अथवा ज्या ला = — × ज्या ना क इसका अर्थ यह हुआ कि नतांश सम्बन्धी लम्बन की ज्या पृथ्वी की त्रिज्या = ——————————— × स्पष्ट नतांश की ज्या चन्द्रमा की दूरी इससे यह सिद्ध होता है कि किसी दिये हुए स्थान के लिए यदि चन्द्रमा या किसी ग्रह की दूरी दी हुई हो तो इसका लम्बन इसके स्पष्ट नतांश की ज्या के अनुसार घटता बढ़ता है, अर्थात् यदि इसका स्पष्ट नतांश कम हो तो लम्बन कम होगा और अधिक हो तो लम्बन अधिक होगा। यदि स्पष्ट नतांश ९०° हो अर्थात् चन्द्रमा या ग्रह उदय या अस्त हो रहा हो तो इसकी ज्या का मान १ होगा जो महत्तम है। ऐसी दशा में नतांश सम्बन्धी लम्बन भी महत्तम अर्थात् सबसे अधिक होगा। महत्तम लम्बन को परम लम्बन या क्षितिज लम्बन कहते हैं क्योंकि इतना बड़ा लम्बन उसी समय होता है जब आकाशीय पिंड उदय या अस्त हो रहा हो और क्षितिज पर हो । यह भी स्पष्ट है कि जब पिंड ठीक खस्वस्तिक पर रहता है तब उसका नतांश शून्य होने