सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३८५
से स्पष्ट नतांश की ज्या भी शून्य होगी और लम्बन का मान शून्य हो जायगा । अर्थात् जब आकाशीय पिंड ठीक सिर के ऊपर खस्वस्तिक पर रहता है तब उसमें नतांश सम्बन्धी लम्बन नहीं होता । यदि क्षितिज लम्बन को ल से प्रकट किया जाय तो ज्या ल = त्र / क यदि पहले समीकरण में त्र / क की जगह ज्या ल रखा जाय तो ज्या ला = ज्या ल × ज्या ना (१) इसका अर्थ यह हुआ कि क्षितिज लम्बन की ज्या को स्पष्ट नतांश की ज्या से गुणा कर दिया जाय तो नतांश सम्बन्धी लम्बन की ज्या आ जायगी । इस सूत्र से लम्बन का ज्ञान तभी हो सकता है जब पिंड का स्पष्ट नतांश ज्ञात हो । यदि यथार्थ नतांश दिया हुआ हो तो दूसरे प्रकार के सूत्र से काम चलेगा जिसका रूप इस प्रकार सिद्ध होता है— चित्र ७४ से स्पष्ट है कि ना = न + ला इसलिए सूत्र (१) से ज्या ला = ज्या ल × ज्या (न + ला) = ज्या ल (ज्या न कोज्या ला + कोज्या न ज्या ला) = ज्या ल ज्या न कोज्या ला + ज्या ल कोज्या न ज्या ला दोनों पक्षों को कोज्या ला से भाग देने पर स्परे ला = ज्या ल ज्या न + ज्या ल कोज्या न स्परे ला स्परे ला को एक पक्ष में करने पर स्परेला = (ज्या ल ज्या न) / (१ — ज्या ल कोज्या न) इस सूत्र से लम्बन का मान उस समय जाना जा सकता है जब यथार्थ नतांश दिया हुआ हो । परन्तु इस रीति से लम्बन जानने में सुविधा नहीं होती क्योंकि इसमें गुणा भाग बहुत करना पड़ता है । इसलिए इसको सरल करने के लिए दूसरा रूप सिद्ध करना चाहिए । यदि दाहिने पक्ष के अंश को हर से भाग दे दिया जाय तो स्परे ला = ज्या ल ज्या न + ज्या² ल ज्या न कोज्या न + ज्या³ ल ज्या न कोज्या² न + ज्या⁴ ल ज्या न कोज्या³ न... इत्यादि
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