भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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३८६ सूर्य-सिद्धान्त इस श्रेणी के आगे के पद इतने छोटे होते जाते हैं कि केवल पहले तीन पद ले लेने में कोई हानि नहीं हो सकती, यदि ल का मान १° से अधिक न हो । स्परेला की जगह ऐसे पद भी रखे जा सकते हैं जिनमें केवल ला हो क्योंकि* ला = स्परेला - १/३ स्परे³ ला जो धनु को उसकी स्पर्शरेखा में प्रकट करने का प्रायः शुद्ध सूत्र है यदि धनु का परिमाण बहुत छोटा हो । इस सूत्र के दूसरे पद के लिए यदि केवल ज्या³ल ज्या³न / ३ ले लिया जाय तो कोई हानि नहीं हो सकती । ऐसी दशा में ला = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या न कोज्या न + ज्या³ ल ज्या न कोज्या²न - ज्या³ल ज्या³न / ३ + …… = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या न कोज्या न

  • ज्या³ल ( ज्या न कोज्या²न - ज्या³न / ३ ) + …… परन्तु ज्या न कोज्या न = ज्या २ न / २ और ज्या न कोज्या²न - ज्या³न / ३ = (३ ज्या न कोज्या²न - ज्या³न) / ३ = (३ ज्या न - ३ ज्या³न - ज्या³न) / ३ = (३ ज्या न - ४ ज्या³न) / ३ = ज्या ३ न / ३ ** इसलिए ला = ज्या ल ज्या न + ज्या²ल ज्या२ न / २ + ज्या³ल ज्या३ न / ३ + ……

  • देखो सुधाकर द्विवेदी का चलन कलन पृष्ठ ४० ** देखो Hall and Knight की त्रिकोणमिति पृष्ठ १०५ (१८९० की छपी)