भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 838 में से

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३६० सूर्य-सिद्धान्त चित्र ७५ विन्दु की दूरी भ व और ध ध्रुव की दूरी भ ध है। द द्रष्टा का स्थान है और स द सा द स्थान की स्पर्शरेखा है जो द की क्षितिज रेखा के तल में है। द खा रेखा स द सा स्पर्शरेखा से समकोण पर है इसलिए यही द स्थान की ऊर्ध्व रेखा है। इसलिए द स्थान का स्पष्ट खस्वस्तिक खा है। यदि यह ऊर्ध्वरेखा पृथ्वी के भीतर बढ़ायी जाय तो पृथ्वी के केन्द्र को न जाकर भ व रेखा के फ विन्दु पर पहुँचेगी। यदि पृथ्वी के केन्द्र से द तक रेखा खींची जाय और वह आकाश की ओर बढ़ाई जाय तो ख विन्दु पर पहुँचेगी। इसलिए यह सिद्ध है कि द स्थान का भूकेन्द्रीय खस्वस्तिक ख है। खा को द स्थान का भौगोलिक खस्वस्तिक कहते हैं। मध्यमाधिकार पृष्ठ ५५ में बतलाया गया है कि द भ व कोण द स्थान का भूकेन्द्रिक अक्षांश है इसलिए द फ व कोण द स्थान का स्पष्ट या भौगोलिक अक्षांश कहलाता है। द स्थान की ऊर्ध्वरेखा द फ और पृथ्वी की त्रिज्या भ द से जो कोण भ द फ बनता है उसे द स्थान के ऊर्ध्वरेखा कोण (angle of the vertical) कहते हैं। किसी स्थान के भौगोलिक अक्षांश को अ और भूकेन्द्रिक अक्षांश को आ अक्षरों से प्रकट* किया जाता है। मुखोपाध्याय की Geometry of Conics पृष्ठ ६३, ६४ से सिद्ध है कि प फ = प भ × थ² / त² *अंग्रेज़ी में भौगोलिक अक्षांश को ϕ और भूकेन्द्रिक अक्षांश को ϕ' से प्रकट किया जाता है।

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