सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 414, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३६१ जहां त, थ क्रम से दीर्घवृत्त से दीर्घ और लघु अक्ष के आधे हैं। परन्तु प द = प भ ×स्परे ∠ प भ द = प फ ×स्परे ∠ प फ द ∵ प भ ×स्परे आ = प फ ×स्परे अ = प भ × थ२/त२ ×स्परे अ ∴स्परे आ = थ२/त२ स्परे अ (५) इसका अर्थ यह हुआ कि किसी स्थान के भौगोलिक अक्षांश की स्पर्शरेखा को थ२/त२ से गुणा कर दिया जाय तो उस स्थान के भूकेन्द्रिक अक्षांश की स्पर्शरेखा आ जायगी। विलोम क्रिया के द्वारा भूकेन्द्रिक अक्षांश दिया हुआ हो तो भौगोलिक अक्षांश भी जाना जा सकता है। यह बतलाया गया है कि त और थ पृथ्वी के दीर्घ और लघु अक्षों के आधे हैं जिनके मान कर्नल क्लार्क के मतानुसार* यह हैं :— त = २,०९,२६,२०२ फुट = ३९६३.३ मील (स्वल्पान्तर से) थ = २,०८,५४,८६५ फुट = ३९४९.८ मील (स्वल्पान्तर से) ∵ थ२/त२ = २०८५४८६५२/२०९२६२०२२ = .९९३१६६५ = .९९३२ उदाहरण १—देहरादून का भौगोलिक अक्षांश ३०°१८′५१″.८ उत्तर है तो इसका भूकेन्द्रिक अक्षांश और ऊर्ध्वरेखा का कोण क्या है ? उपयुक्त सूत्र के अनुसार, स्परे आ = .९९३२ × स्परे ३०°१८′५१″.८ ∵ लरि स्परे आ = लरि .९९३२ + लरि स्परे ३०°१८ = १̄.९९७० + ९̄.७६७० = ९̄.७६४ आ = ३०°८′४०″ यही देहरादून का भूकेन्द्रिक अक्षांश हुआ। यदि इसको भौगोलिक अक्षांश से घटा दिया जाय तो ऊर्ध्वरेखा का कोण १०′१२″ के समान होगा। ऊर्ध्वरेखा के *Hall's Spherical Astronomy pp. 44.