भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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३६२ सूर्य-सिद्धान्त कोण को नाटिकल अलमैनेक में Reduction to Geocentric latitude कहा जाता है । १६२७ ई० के नाटिकल अलमैनेक में इसका मान १०'५''.३ लिखता है । अंतर का कारण यह है कि इस गणना में लघुरिक्थों की शुद्धता केवल चार अङ्कों तक ली गयी है । भूकेन्द्र से किसो स्थान की दूरी इस तरह जानी जा सकती है :— चित्र ७६ चित्र ७६ में व ध वां आधे दीर्घवृत्त का छेद (section) है जो विषुवत् रेखा के व बिन्दु से आरम्भ होकर उत्तरी ध्रुव ध से होता हुआ विषुवत् रेखा की दूसरी ओर वा तक गया है । यदि व वा पर एक अर्धवृत्त व दा वा खींचा जाय तो यही व ध वा का सहायकवृत्त (auxiliary circle) होगा । प भ द कोण भूकेन्द्रिक अक्षांश हुआ जो आ से सूचित किया जायगा । भूकेन्द्र से द स्थान की दूरी भ द को त्र अक्षर से सूचित किया जायगा । त्रिभुज प भ द में प भ = भ द कोज्या आ = त्र कोज्या आ प द = भ द ज्या आ = त्र ज्या आ मुखोपाध्याय की Geometry of Conics पृष्ठ ६५ से सिद्ध है कि प द / प दा = भ ध / भ व = थ / त ∵ प दा = त / थ × प द = त / थ × त्र ज्या आ परन्तु प भ² + प दा² = भ दा² = त² ∵ ( त्र कोज्या आ )² + ( त / थ × त्र ज्या आ )² = त² या त्र² कोज्या² आ + त² / थ² × त्र² ज्या² आ = त²