सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 420, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार ३६७ मान लो कि प = ज्या लि × कोज्या आ / कोज्या क तब ज्या ली = प × ज्या ( घ + ली ) (१) = प ज्या घ कोज्या ली + प कोज्या घ ज्या ली यदि प्रत्येक पक्ष को कोज्या ली से भाग दिया जाय तो स्परे ली = प ज्या घ + प कोज्या घ स्परे ली ∴ स्परे ली = प ज्या घ / १ - प कोज्या घ (२) इस सूत्र का विस्तार करके उसी प्रकार की श्रेणी बनायी जा सकती है जिस प्रकार पृष्ठ ३८५—३८८ में सूत्र (२) को सूत्र (३) के रूप में लाया गया है । इस तरह ली = प ज्या घ / ज्या १" + प² ज्या २ घ / ज्या २" + प³ ज्या ३ घ / ज्या ३" + (३) विषुवांश लम्बन जानने के लिए सूत्र (१) उस समय काम में लाया जा सकता है जब स्पष्ट नतकाल ज्ञात हो और जब यथार्थ नतकाल ज्ञात रहता है तब सूत्र (२) या (३) काम में लाया जाता है। उदाहरण १—चन्द्रमा का विषुवांश लम्बन बतलाओ जब कि द्रष्टा के स्थान का उत्तर अक्षांश ३६°५७'७", इस स्थान के लिए चन्द्रमा का क्षितिज लम्बन ५६'३६".८, चन्द्रमा की उत्तर क्रान्ति २४°५'११".६ और चन्द्रमा का यथार्थ नतकाल ६१°१०'४७".४ । इस स्थान का भूकेन्द्रिक अक्षांश पृष्ठ ३६१ के सूत्र (५) के अनुसार ३६°४५'४७".५ हुआ। लरि ज्या लि = लरि ज्या ५६'३६".८ = ८.२१६०४८ लरि कोज्या अ = लरि कोज्या ३६°४५'४७".५ = ९.८८५७५४ *लरि छेरे क = लरि छेरे २४°५'११".६ = ०.०३६५६३ ∴ लरि प = ८.१६४३६५ लरि ज्या घ = लरि ज्या ६१°१०'४७".४ = ९.९४२५७२ लरि कोछेरे १" = ५.३१४४२५
- पृष्ठ ३६७ में यह माना गया है कि प = ज्या लि × कोज्या आ / कोज्या क परन्तु १ / कोज्या क = छेदन रेखा क = छेरे क, इसलिए प = ज्या लि × कोज्या आ × छेरे क