भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ४११ उन्नतांश क्या है क्योंकि त्रिभोन लग्न के उन्नतांश की ज्या सूत्र (ख) का एक अंग है। त्रिभोन लग्न के नतांश की ज्या को दृक्क्षेप और उन्नतांश की ज्या को अथवा नतांश की कोटिज्या को दृग्गति कहा गया है। चित्र ७६ में दिखलाया गया है कि जब क्रान्तिवृत्त का उदय लग्न क्षितिज के पूर्व बिन्दु के दखिन होता है तब त्रिभोन लग्न यामोत्तरवृत्त से पच्छिम होता है क्योंकि त्रिभोन लग्न उदय लग्न से ३ राशि या ९० अंश कम होता है। त्रिभोन लग्न खस्वस्तिक और कदम्ब बिंदुओं से जाता हुआ ऊर्ध्ववृत्त क्रान्तिवृत्त से समकोण बनाता है और क्षितिज को फ बिन्दु पर काटता है। चित्र ७६ उ पू द फ = स स्थान का क्षितिज वृत्त उ ध ख म व द = स स्थान का यामोत्तर वृत्त ध = उत्तरी आकाशीय ध्रुव ख = खस्वस्तिक म = मध्य लग्न व पू = विषुवद्वृत्त त्र म त अ = क्रान्तिवृत्त त्र = त्रिभोन लग्न त = शरद सम्पात (सायन तुला) क = कदम्ब क ख त्र फ = त्रिभोन लग्न से जाता हुआ ऊर्ध्ववृत्त अ पू = उदय लग्न की अग्रा