सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१६ सूर्य-सिद्धान्त ज्या लि = ज्या ला / ज्या ना अथवा लि = ला / ज्या ना (ख) समीकरण (क) और (ख) को एकत्र करने से लि = च / [२ ज्या (न+ना)/२ कोज्या (न-ना)/२] = च / [ज्या न + ज्या ना] उदाहरण -- यदि द स्थान का उत्तर अक्षांश ५६°२०'३०" और दा का दक्षिण अक्षांश ३३°५५'५" हो तथा द और दा से मंगल ग्रह के यामोत्तर नतांश ६८°१४'६" और २५°२' हो तो मंगल का क्षितिज लम्बन क्या है ? द भ दा = ५६°२०'३०" + ३३°५५'५" = ६३°१५'३५" न+ना = ६८°१४'६" + २५°२' = ६३°१६'६" ∵ च = द च दा = न + ना - द भ दा = ६३°१६'६" - ६३°१५'३५" = ३१" ज्या न = ज्या ६८°१४'६" = .६२८७ ज्या ना = ज्या २५°२' = .४२३१ ∵ ज्या न + ज्या ना = १·३५१८ ∵ क्षितिज लंबन लि = ३१" / १·३५१८ = २२"·६३ यह प्रकट है कि इस रीति से च का मान जानने के लिए हमको दो स्थानों के अक्षांश जानना आवश्यक है। परन्तु यदि हम यह देखें कि जिस समय ग्रह यामोत्तर वृत्त पर है उस समय वह किसी पासवाले तारे से कितना ऊपर या नीचे दोनों स्थानों से देख पड़ता है तो च का मान सहज ही जाना जा सकता है। मान लो कि चित्र ८१ में च ग्रह का स्थान है और त उसी के पास वाले किसी तारे का स्थान है। द से देखने पर त से च का अन्तर त द च कोण के समान है और दा से इन दोनों का अन्तर त दा च कोण के समान है। इसलिए द च दा = त द च + त दा च + द त दा परन्तु तारा त इतनी दूर होता है कि द त दा कोण शून्य के समान होता है। इसलिए द च दा = त द च + त दा च