सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१८ सूर्य-सिद्धान्त कम होता है तब इस रीति से काम लेने में वेध करने की कुछ भूलें ऐसी रह जाती हैं जिनसे फल बहुत अशुद्ध हो जाता है । चन्द्रमा इतने पास है कि यदि पृथ्वी को पूर्ण गोल मानना जाय जैसा कि उपर्युक्त नियम के लिए भ द और भ दा समान समझ लिये गये हैं तो भी कुछ स्थूलता रह जाती है। इसलिए चन्द्रमा का लंबन जानने के लिए भ द को भ दा के समान न समझ कर इनका यथार्थ परिमाण लेना पड़ेगा । यदि ज्या ल की जगह ल और ज्या ला की जगह ला रखा जाय तो ४१४ पृष्ठ के अनुसार. भ द ल = ――― × ज्या न भ च भ दा ला = ――― × ज्या न भ च भ द × ज्या न + भ दा × ज्या ना ∴ च = ल + ला = ――――――――――――――――― भ च त्र परन्तु क्षितिज लम्बन लि = ――― जहां त्र = पृथ्वी की त्रिज्या भ च त्र ∴ भ च = ―― लि त्र ∴ च × ―― = भ द × ज्या न + भ दा × ज्या ना लि च × त्र ∴ लि = ―――――――――――――― भ द × ज्या न + भ दा × ज्या न यहाँ न और ना चन्द्रमा के यथार्थ नतांश हैं। यदि भौगोलिक या स्पष्ट नतांश के अनुसार लि का मान जानना हो तो पृष्ठ ३८३ में बतलायी गयी रीति से भौगोलिक नतांश से यथार्थ मतांश जान लेना चाहिए। उपर्युक्त सूत्र से यह सिद्ध होता है कि द्रष्टा के स्थान में भिन्नता होने से क्षितिज लंबन में भिन्नता होती है क्योंकि भ द और भ दा बदलते रहेंगे। यह बात वेध से भी देखी गयी है कि भिन्न-भिन्न स्थानों में चन्द्रमा का क्षितिज लम्बन भिन्न-भिन्न देख पड़ता है । यह इस बात का प्रमाण है कि पृथ्वी पूर्ण गोल नहीं है वरन् अंडाकार है । सूर्य का लम्बन उपर्युक्त रीति से नहीं जाना जा सकता । इसके लिए कई रीतियां काम में लायी जाती हैं जिनमें से दो नीचे लिखी जाती हैं :- पहली रीति — भूतल पर दो स्थान द और दा ऐसे चुने जाते हैं जो विषवत् रेखा के निकट हैं और परस्पर बहुत दूर हैं। सरलता के लिए यह भी मान लो कि शुक्र की कक्षा शु शु और सूर्य भी विषुवत् रेखा के तल पर है जिस तल पर द, दा