सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० सूर्य-सिद्धान्त वेधों के समय में जो अन्तर होता है उतने ही समय में शुक्र शु बिन्दु से शू बिन्दु पर अपनी कक्षा में जाता है अर्थात् उतने ही समय में शुक्र सूर्य की परिक्रमा शु स शू कोण के समान करता हुआ देख पड़ता है । यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि सूर्य के चारों ओर जाने वाली शुक्र की यह गति शुक्र और पृथ्वी की गतियों के अन्तर के समान है । परंतु हमको मालूम है कि शुक्र और पृथ्वी दोनों कितने समय में सूर्य की परिक्रमा करती हुई एक रेखा में आ जाती है, इसलिए शु स शू या द स दा कोण का परिमाण जाना जा सकता है । जब यह मालूम हो गया कि सूर्यबिम्ब के एक बिन्दु पर भूतल के दो स्थानों से कितना कोण बनता है तब चित्र ८० और ८१ में बतलायी गयी रीति से यह सहज ही जाना जा सकता है कि सूर्य का क्षितिज लम्बन क्या है । व्यवहार में यह रीति इतनी सुविधाजनक नहीं है जितनी देख पड़ती है क्योंकि शुक्र और पृथ्वी की कक्षाएँ एक ही तल में नहीं हैं, दूसरे द, दा स्थानों के देशान्तरों को बहुत ही शुद्धतापूर्वक जानने की आवश्यकता है। यह रीति डीलिस्ले (Delisle) ने चलायी थी। दूसरी रीति—इस रीति में द्रष्टा के स्थानों के देशान्तरों के जानने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती । यहाँ तो केवल यह देखा जाता है कि दो भिन्न-भिन्न स्थानों से शुक्र कितनी देर तक सूर्यबिम्ब के सम्मुख एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाता हुआ देख पड़ता है। इस काम के लिए दो द्रष्टाओं के स्थान परस्पर बहुत दूर परन्तु उत्तर दखिन होने चाहिए। मान लो कि शु शुक्र और द दा भूतल पर द्रष्टा के दो स्थान एक ही तल पर अर्थात् कागज के तल पर हैं और सूर्य का बिम्ब प्रकट करने वाला वृत्त जिसका केन्द्र स है इस तल के समकोण पर है। दा स्थान के द्रष्टा को देख पड़ेगा कि शुक्र अपनी कक्षा में तीर की दिशा में चलता हुआ सूर्य बिम्ब को क ख रेखा में काटता हुआ जाता है। परन्तु द स्थान के द्रष्टा को देख पड़ेगा कि सूर्य के बिम्ब को शुक्र ग घ रेखा में काटता हुआ जाता है। जितनी देर में शुक्र सूर्य के सामने एक किनारे से दूसरे किनारे तक जाता हुआ देख पड़ता है वह समय प्रत्येक स्थान से ध्यानपूर्वक देख कर लिख लेना चाहिए। शुक्र जिस गति से सूर्य के बिम्ब को काटता हुआ निकल जाता है उसकी गणना सहज ही की जा सकती है। यह १ मिनट में ४ विकला के लगभग होती है। इसलिए जब यह मालूम है कि शुक्र क ख या ग घ रेखाओं को कितने समय में पार करता है तब इन रेखाओं के विकलात्मक मान सहज ही और बहुत शुद्धतापूर्वक जाने जा सकते हैं। इसलिए क ख और ग घ चापों के