भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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४३६ सूर्य-सिद्धान्त ओर बढ़ा हुआ है जिस दशा में नली जा रही है। इस प्रकार इन दोनों गतियों के कारण तारे के यथार्थ और स्पष्ट स्थानों में त म ता कोण का अन्तर पड़ता है जिसे भूचलन संस्कार (Aberration) कहते हैं। यह जानना सहज है कि त म ता अथवा द म दा कोण का परिमाण क्या है क्योंकि म द दा त्रिभुज में द दा ज्या द म दा ------ = ------------- म दा ज्या म द दा परन्तु द दा पृथ्वी उतने समय की चाल है जितने समय में प्रकाश म दा के समान चलता है इसलिए द दा और म दा की दूरियों में वही अनुपात है जो पृथ्वी और प्रकाश की गतियों में है। परन्तु पृथ्वी प्रति सेकेन्ड १८ १/२ मील चलती है और प्रकाश १,८६,००० मील चलता है इसलिए ज्या द म दा द दा पृथ्वी की गति १८.५ ------------- = ---- = ------------- = -------- के लगभग ज्या म द दा म दा प्रकाश की गति १८६००० १ = ------- के लगभग १०००० यदि भूचलन संस्कार को भू माना जाय तो ज्या द म दा = ज्या भू = भू जब कि भू का मान रेडियन में हो । ऐसी दशा में १ भू = ------- × ज्या म द दा १०००० यदि भू को विकलाओं में लिखा जाय तो भू" १ १ -------- = ------------- ज्या म द दा = ------------ ज्या त द ता २०६२६५ १०००० १०००० अथवा भू" = २०".६३ ज्या त द सा २०".६३ को भूचलन संस्कार का स्थिराङ्क (coefficient of aberration) कहते हैं। इसका अधिक शुद्ध मान २०".४७ है। यदि त द सा कोण ६०° के समान हो तो यह स्पष्ट है कि भूचलन संस्कार का महत्तम मान २०".४७ होगा। यह स्पष्ट है कि भूचलन संस्कार के स्थिराङ्क में पृथ्वी की गति एक गुणक के रूप में वर्तमान है। परंतु पृथ्वी की गति सदा समान नहीं होती जिस समय पृथ्वी अपने नीच पर रहती है उस समय इसकी गति अत्यन्त तीव्र और जिस समय यह अपने उच्च पर रहती है उस समय इसकी गति अत्यन्त मंद रहती है। इसलिए पहली दशा में भूचलन संस्कार का स्थिराङ्क २०".८० और दूसरी दशा में २०".१३ होता है।