भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार ४३७ भूचलन संस्कार के कारण सूर्य, तारों और दूर के ग्रहों के भोगांश, शर, विषुवांश और क्रान्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है इसकी व्याख्या विस्तार के भय से छोड़ दी जाती है। यहाँ इसकी चर्चा साधारण रीति से कर दी जाती है:— जिस प्रकार वार्षिक लंबन के कारण तारा अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक छोटी सी कक्षा में घूमता हुआ देख पड़ता है उसी प्रकार भूचलन संस्कार के कारण भी वह अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक छोटी सी कक्षा में घूमता हुआ देख पड़त। है। यह कक्षा भी क्रान्तिवृत्त के तल के समानान्तर होती है। इसकी कक्षा का आकार भी उसी प्रकार बदलता है जिस प्रकार लंबन के कारण तारे की कक्षा का आकार बदलता है। जिस समय इसका आकार दीर्घवृत्त की तरह होता है उस समय इसका दीर्घ अक्ष २०''.४७ के समान होता है और लघु अक्ष २०''.४७ ✕ज्या श के समान होती हैं जब कि श तारे का शर या विक्षेप हो । यह स्पष्ट ही है कि तारे का भूचलन संस्कार उसी दिशा में होता है जिस दिशा में पृथ्वी की गति होती है परन्तु जिस दिशा में पृथ्वी की गति होती है उससे ६०° आगे सूर्य रहता है क्योंकि पृथ्वी की गति भूकक्षा की स्पर्शरेखा की दिशा में होती है जो भूकक्षा के अर्द्धव्यास से ६०° का कोण बनाता और सूर्य भूकक्षा के केन्द्र पर रहता है। इसलिए यह सिद्ध हो गया कि तारे का भूचलन संस्कार क्रान्ति- वृत्त के उस बिन्दु की ओर होता है जो सूर्य से ६०° पीछे रहता है अर्थात् जिसका भोगांश सूर्य के भोगांश से ६०° कम होता है । जो तारा क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव अर्थात् कदम्ब पर होता है वह वर्ष भर में अपने यथार्थ स्थान के चारों ओर एक वृत्त पर घूमता हुआ देख पड़ता है जिसके अर्द्धव्यास का कोणात्मक मान २०'.४६ होता है । जो तारा क्रान्तिवृत्त पर होता है वह क्रान्तिवृत्त पर ही अपने यथार्थ स्थान से २०''.४६ आगे और पीछे लोलक की तरह आन्दोलन (Oscillation) करता हुआ देख पड़ता है। इसलिए वर्ष भर में कुल अंतर ४०''.६ के समान पड़ता है। जो तारा किसी और स्थान में रहता है जिससे उसका शर मान लो श के समान होता है, वह वर्ष भर में एक दीर्घवृत्त पर घूमता हुआ देख पड़ता है जिसका केन्द्र तारे का यथार्थ स्थान होता है, जिसके दीर्घ अक्ष का आधा २०''.४६ और लघु अक्ष का आधा २०''.४६ ज्याश तथा जिसका तल क्रान्तिवृत्त के तल के समानान्तर होता है ! इस पर बहुत से पाठक पूछ बैठेंगे कि वार्षिक लंबन और भूचलन संस्कार में फिर अंतर क्या है। इसका उत्तर यह है कि वार्षिक लम्ब के कारण तारा जिस