भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

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४५४ सूर्य-सिद्धान्त चन्द्रकक्षा में भूछाया का योजनात्मक व्यास = १६०० चा / ७६०·५६ - ( ६५०० रा / ५६·१३६२ - १६०० ) × ४८० / ६५०० यदि इसको १५ से भाग दे दिया जाय तो चन्द्रकक्षा में भूछाया का कालात्मक व्यास = १०६ २/३ × चा / ७६०·५६ - ३२ × रा / ५६·१३६२ + ७·८८ जिस समय चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट गतियां इनकी मध्यम गतियों के समान होंगी उस समय चा / ७६०·५६ और रा / ५६·१३६२ एक के समान होंगे । ऐसी दशा में भूछाया का कलात्मक व्यास १०६·६७ - ३२ + ७·८८ = ८२·५५ चित्र ६३ की सहायता से आरंभ में यह बतलाया जा चुका है कि भूभार्ध अर्थात् चन्द्रकक्षा में पृथिवी की छाया का अर्धव्यास ४१' ५७" होता है जिससे पृथिवी की छाया का व्यास ८४' के लगभग आता है । इसलिए यह स्पष्ट है कि सूर्य-सिद्धान्त के नियम से पृथिवी की छाया का व्यास जितना आता है वह नवीन रीति से निकाले हुए व्यास के प्रायः समान ही होता है यद्यपि उसके उपकरण स्थूल और अशुद्ध हैं । भारतीय रीति से भूछाया के व्यास का जो परिमाण आता है वह तीन पदों १०६·६७, ३२ और ७·८८ के योग वियोग से सिद्ध होता है ।