सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 478, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंचन्द्रग्रहणाधिकार ४५३ तीसरे श्लोक के उत्तरार्द्ध में यह भी बतलाया गया है कि चन्द्रमा की कक्षा में सूर्य बिम्ब का जो व्यास योजनों में हो उसको १५ से भाग देने पर इसका परिमाण कलाओं में आ जायगा। इसका कारण यह है कि चन्द्रकक्षा का विस्तार ३२४००० योजन माना गया है जो ३६० अंश या २१६०० कला के समान भी है इसलिए जब २१६०० कला = ३२४००० योजना तब १ कला = ३२४००० / २१६०० = १५ योजन जिसका अर्थ यह हुआ कि चन्द्रकक्षा का १५ योजन एक कला के समान होता है । चन्द्रकक्ष में भूछाया के व्यास का परिमाण— शशाङ्ककक्ष्यागुणितो भाजितो वाऽर्ककक्ष्यया । विष्कम्भश्चन्द्रकक्ष्यायां तिथ्याप्तो मानलिप्तिकाः ॥४॥ स्फुटेन्दुभुक्तिभूव्यासगुणिता मध्ययोद्धृता । लब्धं सूची महीव्यासस्फुटार्कश्रवणान्तरम् ॥५॥ मध्येन्दुव्यासगुणितं मध्यार्कव्यासभाजितम् । विशोध्य लब्धं सूच्यास्तु तमो लिप्ताश्च पूर्ववत् ॥६॥ अनुवाद—(४) चन्द्रमा की स्पष्ट गति को पृथ्वी के व्यास से गुणा करके गुणनफल को चन्द्रमा की मध्य गति से भाग देने पर जो लब्धि आती है उसे सूची कहते हैं। सूर्य के स्फुट व्यास से पृथ्वी के व्यास को घटाकर (५) शेष को चंद्रमा के मध्यम व्यास से गुणा करके और गुणनफल को सूर्य के मध्यम व्यास से भाग दे दो । लब्धि को सूची से घटा देने पर जो शेष आवेगा वह चन्द्रकक्षा में पृथ्वी की छाया का व्यास योजनों में आ जायगा । इसको पहले की तरह १५ से भाग दे देने पर भूछाया का व्यास कलाओं में ज्ञात हो जायगा । विज्ञान भाष्य—यहाँ चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट गतियों को चा और रा अक्षरों से सूचित किया जायगा । यदि चन्द्रमा और सूर्य के महायुगीन भगणों को महायुगीन सावन दिनों से भाग दे दिया जाय और लब्धि की कलाएं बनायी जायें तो चन्द्रमा और सूर्य की मध्यम दैनिक गतियाँ क्रमानुसार ७६०' ०५६ और ५६' ०१३६२ होती हैं। पृथ्वी का व्यास १६०० योजन माना गया है (देखो मध्यमा- धिकार श्लोक ५६) । इन मानों के आधार पर उपर्युक्त दो श्लोकों को संक्षेप में इस प्रकार लिखा जा सकता है— सूची = १६०० x चा / ७६०·५६ सूर्य का स्फुट व्यास = ६५०० x रा / ५६·१३६२ (देखो श्लोक २) ।