भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 48

मध्यमाधिकार २३ कुर्व्वन्तीत्यत्रागम एव प्रमाणम् । स चागमो महता कालेन लेखकाध्यापकाध्येतृ दोषैर्बहुधा जातः; तदा कतमस्य प्रामाण्यम् ? अथ यद्येवमुच्यते गणितस्कन्ध उपपत्तिमानेवागमः प्रमाणम् । उपपत्त्या ये सिध्यन्ति भगणास्ते ग्राह्याः । तदपि न । यतोऽतिप्राज्ञेन पुरुषे- णोपपत्तिर्ज्ञातुमेव शक्यते । न तया तेषां भगणानामियत्ता कर्तुं शक्यते; पुरुषायुषो- ऽल्पत्वात् । उपपत्तौ तु ग्रहः प्रत्यहं यन्त्रेण वेध्यः, भगणान्तं यावत् । एव शनैश्चरस्य तावद्वर्षाणां त्रिंशता भगणः पूर्य्यते । मन्दोच्चानान्तु वर्षशतैरनेकैः । अतो नायमर्थः पुरुषसाध्य इति । अत एवातिप्राज्ञा गणकाः साम्प्रतोपलब्ध्यनुसारिणं प्रौढ़गणकस्वीकृतं कमप्यागममङ्गीकृत्य ग्रहगणित आत्मनो गणितगोलयोनिरतिशयं कौशलं दर्शयितुं तथाऽन्यैर्भ्रान्ति ज्ञानेनान्यथोदितानर्थांश्च निराकर्त्तुमन्यान् ग्रन्थान् रचयन्ति । ग्रह गणित इति कर्त्तव्यतायामस्माभिः कौशलं दर्शनायं भवत्वागमो योऽपिको ऽप्ययमाशयस्तेषाम् ।* अर्थ--किन्तु यह रीति केवल वही जान सकता है जिसने (ज्योतिःशास्त्र की) विशेष भाषा में कुशलता प्राप्त की हो, नक्षत्रादि के स्थानों को जानता हो और जिसने भूगोल खगोल के बारे में अच्छी तरह सुना हो । अपने अपने मार्गों में जाते हुए ग्रह, मन्दोच्च, शीघ्रोच्च तथा पात एक कल्प में इतने भगण करते हैं, इसका प्रमाण आगम अर्थात् परम्परागत ज्ञान ही है । किन्तु अधिक समय बीतने के कारण लेखकों, अध्यापकों तथा पढ़ने वालों की भूल से आगम अनेक हो गये हैं ! इसलिए प्रश्न होता है कि कौन-सा आगम प्रमाण माना जाय । यदि ऐसा कहा जाय कि जो आगम गणित के अनुसार खरा सिद्ध हो उसी को प्रमाण मानकर जो भगण निकले वही माने जायें तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि अत्यन्त ज्ञानी पुरुष भी केवल रीति के ही जानने में समर्थ हो सकता है; परन्तु रीति से ग्रहों के भगण की संख्या नहीं निकाल सकता । कारण यह है कि मनुष्य की आयु बहुत थोड़ी होती है और उपपत्ति जानने के लिए ग्रह को प्रतिदिन वेध करना होता है, जब तक कि भगण पूरा न हो । इस तरह शनिश्चर का एक भगण ३० वर्षों में पूरा होता है। मन्दोच्चों के भगण तो अनेक शताब्दियों में पूरे होते हैं । इसलिए यह कार्य पुरुषसाध्य नहीं है । इसलिए बुद्धिमान गणक किसी ऐसे आगम को मानकर जो उस समय ठीक समझा जाता हो और जिसको प्रतिष्ठाप्राप्त गणक ने स्वीकार कर लिया हो, अपनी गणित तथा गोल सम्बन्धी ग्रहों की गणना की कुशलता दिखाने के लिए तथा भ्रमवश जो कुछ अनर्थ- कारी दोष आ गये हैं उनके दूर करने के लिए, दूसरे ग्रंथ बनाते हैं । उनका यह अभिप्राय है कि हमको ग्रहों की ठीक गणना करने में कुशलता दिखानी चाहिये, आगम चाहे जो हो । *सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृ० १६-१७ (कलकत्ते का छपा । द्वितीय संस्करण)