सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ सूर्य सिद्धान्त
हुई जान पड़ती हैं और उन पतंगों की गतियों में भिन्नता होने से यह बिन्दु एक ही दिशा में नहीं देख पड़ता । इन्हीं बिन्दुओं को चन्द्रमा के पात कहते हैं। चन्द्रमा अपनी कक्षा में चलता हुआ आधे भ्रमण काल तक क्रान्तिवृत्त के उत्तर और आधे भ्रमण काल तक क्रान्तिवृत्त के दक्खिन रहता है। जब वह अपने पात पर पहुँचता है तब या तो वह क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर बढ़ता है और/या दक्खिन की ओर । जिस पात पर पहुँच कर वह उत्तर की ओर जाता है उसे उत्तर पात (Ascending node) और जिस पात पर पहुँच कर वह दक्खिन की ओर जाता है उसे दक्खिन पात (Descending node) कहते हैं। उत्तर पात को राहु तथा दक्खिन पात को केतु भी कहते हैं। जब चन्द्रमा पूर्णमासी या अमावस्या के समय इन्हीं पातों के पास होता है तब चन्द्र-ग्रहण या सूर्य-ग्रहण लगता है; इसीलिए यह कल्पना हो गयी कि राहु और केतु राक्षस हैं, जो ग्रहण के कारण होते हैं। कुछ लोग पृथ्वी की छाया की नोक को राहु और चन्द्रमा की छाया की नोक को केतु मानते हैं; परन्तु यह भ्रम है। इन पातों के स्थान भी स्थिर नहीं हैं वरन् पश्चिम की ओर खिसकते हुए जान पड़ते हैं। जितने समय में यह पश्चिम की ओर खिसकते हुए एक परिक्रमा कर लेते हैं उतने समय को इनका भगण-काल कहते हैं। इसी तरह अन्य ग्रहों के पातों के बारे में समझ लेना चाहिये । यह पश्चिम की ओर क्यों खिसकते हैं, इसका कारण भौतिक ज्योतिर्विज्ञान (Physical Astronomy) में बहुत ही सूक्ष्मगणित के द्वारा समझाया गया है, जो उचित स्थान पर इस विज्ञान भाष्य में भी समझाया जायगा । चित्र ४ में यदि स र सा क को सूर्य का मार्ग अर्थात् क्रान्तिवृत्त समझा जाय और च र चा क को चन्द्रकक्षा तो र और क बिन्दु चन्द्रमा के पात कहलाते हैं। चन्द्रमा तीर की दिशा में भ्रमण करता हुआ जब र पात से आगे बढ़ता है तब क्रान्तिवृत्त से उत्तर हो जाता है और र चा क भाग तक उत्तर रहता है, इसलिए र पात को उत्तर पात कहते हैं । क बिन्दु पर पहुँच कर चन्द्रमा क्रान्तिवृत्त से दक्खिन जाता है, इसलिए क दक्खिन पात कहा जाता है। भारतीय ज्योतिषी चन्द्रमा के उत्तर पात को राहु तथा दक्षिण पात को केतु कहते हैं । चा र सा कोण क्रान्तिवृत्त और चन्द्रकक्षा के तलों के बीच का कोण है, जिसका मान ५° के लगभग है। इसी कोण को चंद्रमा का विक्षेप कहते हैं, जिसकी चर्चा इसी अध्याय के ६८वें श्लोक में की गयी है । यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि ऊपर जो भगण काल दिये हुए हैं वह कैसे जाने गये और भिन्न-भिन्न मतों में अन्तर क्यों है। इसका उत्तर भास्कराचार्य जी के मतानुसार यों है :— सातु तत्तद्भाषाकुशलेन तत्तत् क्षेत्रसंस्थानज्ञेन श्रुत गोलेनैव श्रोतुं शक्यते, नान्येन । ग्रह मन्द शीघ्रोच्च पाताः स्व स्वमार्गेषु गच्छन्तः एतावतः पर्ययान् कल्पे