सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
२४ सूर्य सिद्धान्त
हुई जान पड़ती हैं और उन पतंगों की गतियों में भिन्नता होने से यह बिन्दु एक ही दिशा में नहीं देख पड़ता । इन्हीं बिन्दुओं को चन्द्रमा के पात कहते हैं। चन्द्रमा अपनी कक्षा में चलता हुआ आधे भ्रमण काल तक क्रान्तिवृत्त के उत्तर और आधे भ्रमण काल तक क्रान्तिवृत्त के दक्खिन रहता है। जब वह अपने पात पर पहुँचता है तब या तो वह क्रान्तिवृत्त से उत्तर की ओर बढ़ता है और/या दक्खिन की ओर । जिस पात पर पहुँच कर वह उत्तर की ओर जाता है उसे उत्तर पात (Ascending node) और जिस पात पर पहुँच कर वह दक्खिन की ओर जाता है उसे दक्खिन पात (Descending node) कहते हैं। उत्तर पात को राहु तथा दक्खिन पात को केतु भी कहते हैं। जब चन्द्रमा पूर्णमासी या अमावस्या के समय इन्हीं पातों के पास होता है तब चन्द्र-ग्रहण या सूर्य-ग्रहण लगता है; इसीलिए यह कल्पना हो गयी कि राहु और केतु राक्षस हैं, जो ग्रहण के कारण होते हैं। कुछ लोग पृथ्वी की छाया की नोक को राहु और चन्द्रमा की छाया की नोक को केतु मानते हैं; परन्तु यह भ्रम है। इन पातों के स्थान भी स्थिर नहीं हैं वरन् पश्चिम की ओर खिसकते हुए जान पड़ते हैं। जितने समय में यह पश्चिम की ओर खिसकते हुए एक परिक्रमा कर लेते हैं उतने समय को इनका भगण-काल कहते हैं। इसी तरह अन्य ग्रहों के पातों के बारे में समझ लेना चाहिये । यह पश्चिम की ओर क्यों खिसकते हैं, इसका कारण भौतिक ज्योतिर्विज्ञान (Physical Astronomy) में बहुत ही सूक्ष्मगणित के द्वारा समझाया गया है, जो उचित स्थान पर इस विज्ञान भाष्य में भी समझाया जायगा । चित्र ४ में यदि स र सा क को सूर्य का मार्ग अर्थात् क्रान्तिवृत्त समझा जाय और च र चा क को चन्द्रकक्षा तो र और क बिन्दु चन्द्रमा के पात कहलाते हैं। चन्द्रमा तीर की दिशा में भ्रमण करता हुआ जब र पात से आगे बढ़ता है तब क्रान्तिवृत्त से उत्तर हो जाता है और र चा क भाग तक उत्तर रहता है, इसलिए र पात को उत्तर पात कहते हैं । क बिन्दु पर पहुँच कर चन्द्रमा क्रान्तिवृत्त से दक्खिन जाता है, इसलिए क दक्खिन पात कहा जाता है। भारतीय ज्योतिषी चन्द्रमा के उत्तर पात को राहु तथा दक्षिण पात को केतु कहते हैं । चा र सा कोण क्रान्तिवृत्त और चन्द्रकक्षा के तलों के बीच का कोण है, जिसका मान ५° के लगभग है। इसी कोण को चंद्रमा का विक्षेप कहते हैं, जिसकी चर्चा इसी अध्याय के ६८वें श्लोक में की गयी है । यहाँ यह प्रश्न किया जा सकता है कि ऊपर जो भगण काल दिये हुए हैं वह कैसे जाने गये और भिन्न-भिन्न मतों में अन्तर क्यों है। इसका उत्तर भास्कराचार्य जी के मतानुसार यों है :— सातु तत्तद्भाषाकुशलेन तत्तत् क्षेत्रसंस्थानज्ञेन श्रुत गोलेनैव श्रोतुं शक्यते, नान्येन । ग्रह मन्द शीघ्रोच्च पाताः स्व स्वमार्गेषु गच्छन्तः एतावतः पर्ययान् कल्पे
मध्यमाधिकार २३ कुर्व्वन्तीत्यत्रागम एव प्रमाणम् । स चागमो महता कालेन लेखकाध्यापकाध्येतृ दोषैर्बहुधा जातः; तदा कतमस्य प्रामाण्यम् ? अथ यद्येवमुच्यते गणितस्कन्ध उपपत्तिमानेवागमः प्रमाणम् । उपपत्त्या ये सिध्यन्ति भगणास्ते ग्राह्याः । तदपि न । यतोऽतिप्राज्ञेन पुरुषे- णोपपत्तिर्ज्ञातुमेव शक्यते । न तया तेषां भगणानामियत्ता कर्तुं शक्यते; पुरुषायुषो- ऽल्पत्वात् । उपपत्तौ तु ग्रहः प्रत्यहं यन्त्रेण वेध्यः, भगणान्तं यावत् । एव शनैश्चरस्य तावद्वर्षाणां त्रिंशता भगणः पूर्य्यते । मन्दोच्चानान्तु वर्षशतैरनेकैः । अतो नायमर्थः पुरुषसाध्य इति । अत एवातिप्राज्ञा गणकाः साम्प्रतोपलब्ध्यनुसारिणं प्रौढ़गणकस्वीकृतं कमप्यागममङ्गीकृत्य ग्रहगणित आत्मनो गणितगोलयोनिरतिशयं कौशलं दर्शयितुं तथाऽन्यैर्भ्रान्ति ज्ञानेनान्यथोदितानर्थांश्च निराकर्त्तुमन्यान् ग्रन्थान् रचयन्ति । ग्रह गणित इति कर्त्तव्यतायामस्माभिः कौशलं दर्शनायं भवत्वागमो योऽपिको ऽप्ययमाशयस्तेषाम् ।* अर्थ--किन्तु यह रीति केवल वही जान सकता है जिसने (ज्योतिःशास्त्र की) विशेष भाषा में कुशलता प्राप्त की हो, नक्षत्रादि के स्थानों को जानता हो और जिसने भूगोल खगोल के बारे में अच्छी तरह सुना हो । अपने अपने मार्गों में जाते हुए ग्रह, मन्दोच्च, शीघ्रोच्च तथा पात एक कल्प में इतने भगण करते हैं, इसका प्रमाण आगम अर्थात् परम्परागत ज्ञान ही है । किन्तु अधिक समय बीतने के कारण लेखकों, अध्यापकों तथा पढ़ने वालों की भूल से आगम अनेक हो गये हैं ! इसलिए प्रश्न होता है कि कौन-सा आगम प्रमाण माना जाय । यदि ऐसा कहा जाय कि जो आगम गणित के अनुसार खरा सिद्ध हो उसी को प्रमाण मानकर जो भगण निकले वही माने जायें तो यह भी ठीक नहीं है । क्योंकि अत्यन्त ज्ञानी पुरुष भी केवल रीति के ही जानने में समर्थ हो सकता है; परन्तु रीति से ग्रहों के भगण की संख्या नहीं निकाल सकता । कारण यह है कि मनुष्य की आयु बहुत थोड़ी होती है और उपपत्ति जानने के लिए ग्रह को प्रतिदिन वेध करना होता है, जब तक कि भगण पूरा न हो । इस तरह शनिश्चर का एक भगण ३० वर्षों में पूरा होता है। मन्दोच्चों के भगण तो अनेक शताब्दियों में पूरे होते हैं । इसलिए यह कार्य पुरुषसाध्य नहीं है । इसलिए बुद्धिमान गणक किसी ऐसे आगम को मानकर जो उस समय ठीक समझा जाता हो और जिसको प्रतिष्ठाप्राप्त गणक ने स्वीकार कर लिया हो, अपनी गणित तथा गोल सम्बन्धी ग्रहों की गणना की कुशलता दिखाने के लिए तथा भ्रमवश जो कुछ अनर्थ- कारी दोष आ गये हैं उनके दूर करने के लिए, दूसरे ग्रंथ बनाते हैं । उनका यह अभिप्राय है कि हमको ग्रहों की ठीक गणना करने में कुशलता दिखानी चाहिये, आगम चाहे जो हो । *सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृ० १६-१७ (कलकत्ते का छपा । द्वितीय संस्करण)
२६ सूर्य सिद्धान्त सूर्य, बुध और शुक्र के भगण के सम्बन्ध में भास्कराचार्य जी कहते हैं कि कल्प में जितने वर्ष होते हैं उतने ही सूर्य के भगण होते हैं। इसलिए सूर्य का भगण काल ही वर्ष है। बुध और शुक्र रवि के पास कभी कुछ आगे और कभी कुछ पीछे सदा अनुचर की तरह रहते हैं। इसलिए इनके भगण भी रवि भगण के समान हुए । सूर्य का भगण काल जानने के लिए यह युक्ति बतलायी गयी है— समतल भूमि में एक वृत्त खींचकर उसमें दिशाओं के चिह्न लगा लो । जब सूर्य उत्तरायण हो तब जिस दिन वह पूर्व दिशा से कुछ ही दक्षिण होकर उदय हो उस दिन वृत्त के मध्य में गड़ी हुई कील के द्वारा उदय होते हुए सूर्य को बेध लो । इसके बाद एक वर्ष तक सूर्य के उदय की गणना करनी चाहिये । एक वर्ष में ३६५ बार उदय होगा । अन्तिम उदय पहले दिन के उदय-स्थान के कुछ दक्षिण होगा । इन दोनों में अन्तर हो वह लिख लो । दूसरे दिन फिर उदय होते हुए सूर्य को बेध करो । इस दिन यह पूर्व दिशा से कुछ उत्तर हो कर उदय होगा । पिछले दिन के उदय स्थान से कितना उत्तर होकर उदय होता है इसको भी जान लो । फिर अनुपात के द्वारा यह जान लो कि जब ६० घड़ी में इतना उत्तर बढ़ता है तब पहला अन्तर कितने समय में हुआ होगा। इस प्रकार १५ घड़ी ३० पल २२ विपल ३० प्रति- विपल और ३६५ सावन दिनों में सूर्य का उदय उसी स्थान पर होता है जिस स्थान पर वर्ष के आरम्भ में हुआ था । इसलिए यही समय सूर्य का भगण काल हुआ । फिर अनुपात के द्वारा यह जान लो कि जब १ वर्ष में उतने सावन दिन होते हैं तब १ कल्प वर्षों में कितने सावन दिन होते हैं, इत्यादि । आजकल वसन्त-सम्पात जानने के लिए जो रीति काम में लायी जाती है उससे भास्कराचार्य जी की बतलायी हुई रीति बहुत कुछ मिलती है। अन्तर यह है कि भास्कराचार्य जी ने क्षितिजवृत्त पर बेध करने को कहा है और आजकल याम्योत्तर- वृत्त पर बेध किया जाता है, जिससे लम्बन और प्रकाश वक्रीभवन के कारण कोई भूल नहीं हो सकती; दूसरा अंतर यह पड़ता है कि आजकल के यन्त्र बहुत सूक्ष्म हैं पर भास्कराचार्य की बतलायी हुई रीति में कोरी आंख से ही काम लिया गया है। चन्द्र भगण की उपपत्ति भी गोल यन्त्र के द्वारा जिसमें नक्षत्र-चक्र, क्रान्तिवृत्त, विषुवद्वृत्त, चंद्रकक्षा, ग्रहकक्षा इत्यादि बने रहते हैं, वेध करके जानना चाहिये । इसका वर्णन बहुत विस्तार के साथ करने की आवश्यकता नहीं जान पड़ती । यह केवल इसलिए लिखा गया है कि प्राचीन ज्योतिषी भी बेध के द्वारा ग्रन्थ में दी हुई बातों की परीक्षा करते थे और जो ठीक निकलता था उसी को मानते थे ।
मध्यमाधिकार २७ चन्द्रोच्च का भगणकाल जानने की रीति प्रतिदिन गोल यंत्र के द्वारा चंद्रमा का बेध करके स्पष्ट गति निकालनी चाहिये । जिस दिन गति सबसे कम हो उस दिन मध्यम और स्पष्ट चन्द्रमा के स्थानों में अंतर नहीं होता । यही चंद्रमा के उच्च का स्थान है। इसी प्रकार प्रतिदिन वेध करते-करते जब चन्द्रमा की गति फिर परम अल्प हो तब उसी स्थान को उच्च समझना चाहिये । यह स्थान पहले स्थान से कुछ आगे रहता है। कितना आगे हो जाता है यह जानकर अनुपात के द्वारा यह गणित कर लेना चाहिये कि उच्च की दैनिक गति कितनी होती है तथा एक भगण काल कितने दिन में पूरा होता है । चन्द्रपात का भगण काल जानने की रीति-प्रति दिन चन्द्रमा का बेध करते हुए यह देखना चाहिये कि किस दिन चन्द्रमा का दक्षिण विक्षेप कम होते-होते शून्य हो जाता है। जिस समय विक्षेप शून्य हो उस समय चन्द्रमापात स्थान पर होता है । इसी प्रकार जब दूसरे चक्कर में चंद्रमा का दक्षिण विक्षेप कम होते-होते शून्य हो जाय तब समझना चाहिये कि वह अपने पात पर पहुँच गया । दूसरी बार पात का स्थान पहले स्थान से कुछ पश्चिम होता है, इसीलिए यह कहा जाता है कि पात की गति विलोम होती है अर्थात् पश्चिम की ओर होती है। फिर अनुपात के द्वारा जानना चाहिये कि जब इतने दिन में पात इतना चलता है तो एक दिन में कितना चलेगा । यही पात की दैनिक गति समझनी चाहिये । इसी प्रकार यह भी जानना चाहिये कि एक कल्प में कितने भगण होते हैं । मंगल, गुरु और शनि के शीघ्रोच्चों के सम्बन्ध में- जब सूर्य, शनि, गुरु या मंगल से आगे रहता है तब ग्रह मध्यम स्थान से कुछ आगे रहते हैं और जब सूर्य पीछे रहता है तब ग्रह मध्यम स्थान से पीछे रहते हैं; इसलिए विद्वानों ने यह कल्पना की कि इन तीनों के शीघ्रोच्च सूर्य के साथ ही रहते हैं और ग्रहों को अपनी ओर अर्थात् सूर्य की ओर आकर्षित करते हैं; इसलिए इनके शीघ्रोच्चों के भगण सूर्य के समान होते हैं । भानामष्टाक्षिखस्वद्रित्रिद्विद्व्यष्टशरेन्दवः । भोदया भगणैः स्वैः स्वैरूनाः स्वस्वोदया युगे ॥३४॥ अनुवाद-१ महायुग में नक्षत्रों के १,५८,२२,३७,८२८ भगण होते हैं। किसी ग्रह के महायुगीय भगण को नक्षत्र के महायुगीय भगण में से घटा देने से जो बचता है उतने ही बार एक महायुग में वह ग्रह पूर्व क्षितिज में उदय होता है ।।३४।। विज्ञान भाष्य-१२वें श्लोक के विज्ञान भाष्य में नाक्षत्र-अहोरात्र की परिभाषा दी गयी है। एक नाक्षत्र-अहोरात्र में तारे पश्चिम की ओर चलते हुए एक
१. मध्यमाधिकार व स्पष्टाधिकार (ग्रहों की गति गणित)
२६ सूर्य सिद्धान्त परिक्रमा कर लेते हैं। इसी परिक्रमा को नाक्षत्र भगण कहते हैं। इसलिए एक महायुग में जितने नाक्षत्र भगण होते हैं उतने ही नाक्षत्र-अहोरात्र होते हैं । ऊपर के श्लोक के पिछले भाग में यह जानने की रीति बतलायी गयी है कि एक महायुग में कौन ग्रह कितने बार पूर्वक्षितिज में उदय होता है। एक महायुग में ग्रह के जितने भगण होते हों उसको एक महायुग के नाक्षत्र भगण की संख्या से घटा दो; शेष जो संख्या होगी उतने ही बार वह ग्रह एक महायुग में पूर्व-क्षितिज में उदय होगा । मान लो कि यह जानना है कि सूर्य पूर्व-क्षितिज में एक महायुग में कितनी बार उदय होता है। २६वें श्लोक में बतलाया गया है कि सूर्य एक महायुग में ४३,२०,००० भगण करता है। इसको यदि महायुगीय नाक्षत्र भगण १,५८,२२,३७, ८२८ में से घटा दिया जाय तो शेष १,५७,७६,१७,८२८ होता है । इतने ही बार सूर्य पूर्व क्षितिज में एक महायुग में उदय होता है। परन्तु १२वें श्लोक के विज्ञान- भाष्य में यह बतलाया गया है कि सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय तक के समय को सावन दिन कहते हैं। इसलिए ३४वें श्लोक के अनुसार १ महायुग में १,५७,७६,१७, ८२८ सावन दिन होते हैं। इसी तरह और ग्रहों के उदय की संख्या भी जानी जा सकती है। इसकी उपपत्ति यह हैः-यदि किसी दिन सूर्य किसी तारे के साथ उदय हो तो दूसरे दिन वह तारा सूर्य से कोई ३ मिनट ५६ सेकंड पहले उदय होता है। क्योंकि इतने समय में सूर्य कोई एक अंश पूर्व की ओर चला जाता है। तीसरे दिन वह तारा सूर्य से ३ मिनट ५६ सेकंड के दूने समय अर्थात् ७ मिनट ५२ सेकंड पहले उदय होगा, चौथे दिन उसके तिगुने समय पहले और १६वें दिन उसके १५गुने समय पहले अर्थात् ५६ मिनट वा १ मिनट कम १ घंटा पहले वह तारा उदय होगा । इस तरह पिछड़ते पिछड़ते ३६१वें दिन अर्थात् ३६० नाक्षत्र दिन बाद वह तारा सूर्य से २४ मिनट कम २४ घंटे पहले और ३६६ नाक्षत्र दिन बाद पूरे २४ घंटे अर्थात् १ दिन पहले उदय होगा जब कि सूर्य और वह तारा फिर साथ हो जावेंगे । इसलिए जितने समय में नक्षत्र ३६६ भगण करता है उतने समय में सूर्य १ बार कम उदय होता है और एक भगण पूरा करता है। इसलिए सूर्य एक भगण काल में (१ सौर वर्ष में ) ३६६-१ बार उदय होता है। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के उदय के बारे में समझना चाहिये । भवन्ति शशिनो मासाः सूर्येन्दुभगणान्तरम् । रविमासोनितास्ते तु शेषाः स्युरधिमासकाः ॥३५॥ अनुवाद - सूर्य और चन्द्रमा के महायुगीय भगणों का जो अंतर होता है
मध्यमाधिकार २६ उतने ही चान्द्र मास एक महायुग में होते हैं। एक महायुग में जितने सौर मास होते हैं उनकी संख्या को महायुगीय चान्द्र मासों की संख्या से घटा देने पर शेष अधिमासों की संख्या होती है ॥३५॥ विज्ञान भाष्य—जिस समय सूर्य और चन्द्रमा की युति होती है उस समय को अमावस्या कहते हैं। इस समय चन्द्रमा और सूर्य बहुत पास होते हैं। एक अमा- वस्या से दूसरी अमावस्या तक के समय को चान्द्र-मास कहते हैं। इसलिए यदि यह जानना हो कि एक महायुग में कितने चान्द्र मास होते हैं तो पहले यह जानना चाहिये कि एक महायुग में सूर्य और चन्द्रमा की युति कितने बार होती है। इसके लिए सूर्य और चन्द्रमा के महायुगीय भगणों का अंतर निकाल लेना पर्याप्त है। क्योंकि यह बात सहज ही जानी जा सकती है कि यदि दो लड़के किसी गोल मैदान का चक्कर लगाने लगें और यदि एक लड़का घण्टे में ५ चक्कर लगाता हो और दूसरा ३ तो दोनों यदि एक ही स्थान से एक ही समय दौड़ना आरंभ करें तो घण्टे . भर में दोनों लड़के ५-३ = २ बार एक दूसरे से मिलेंगे। इसके लिए घड़ी की घण्टा और मिनट बतलाने वाली सुइयों की चाल का उदाहरण बहुत उपयुक्त है। बारह बजे दोनों सुइयां एक दूसरे से मिली रहती हैं अर्थात् दोनों की युति रहती है। इसके बाद दोनों चक्कर लगाना आरम्भ करती हैं और १ बज कर ५ ५/११ मिनट पर पहले पहल मिलती हैं। दूसरी बार वे २ बज कर १० १०/११ मिनट पर, तीसरी बार ३ बज कर १६ ४/११ मिनट पर, चौथी बार ४ बज कर २१ ९/११ मिनट पर, पांचवीं बार ५ बज कर २७ ३/११ मिनट पर, छठी बार ६ बज कर ३२ ८/११ मिनट पर, सतवीं बार ७ बज कर ३८ २/११ मिनट घर, आठवीं बार ८ बज कर ४३ ७/११ मिनट पर, ६ वीं बार ९ बज कर ४९ १/११ मिनट पर दसवीं बार १० बज कर ५४ ६/११ मिनट पर और ११ वीं बार ठीक बारह बजे मिलेंगी। इन ग्यारह युतियों के लिए मिनट वाली सुई को १२ चक्कर और घण्टे वाली सुई को १ चक्कर लगाना पड़ा। इसलिए युतियों की संख्या दोनों के चक्करों का अंतर (१२-१) हुई। इसी प्रकार महायुगीय चान्द्र-मासों को संख्या = महायुगीय चन्द्र-भगण—महायुगीय सूर्य-भगण = ५,७७,५३,३३६—४३,२०,००० = ५,३४,३३,३३६ अधिमास—मासों की गणना चान्द्र मास से और वर्षों की गणना सौर वर्ष से होती है। एक सौर वर्ष में १२ सौर मास तथा ३६५·२५८७५ मध्यम सावन दिन होते हैं परन्तु १२ चांद्रमास ३५४·३६७०५ मध्यम सावन दिन का होता है; इसलिए
३० सूर्य सिद्धान्त
१२ चान्द्रमासों का वर्ष सौर वर्ष से १०.८६१७० मध्यम सावन दिन छोटा होता है; इसलिए कोई तैंतीस महीने में यह अन्तर एक चान्द्रमास के समान हो जाता है। जिस सौर वर्ष में यह अंतर १ चांदमास के समान हो जाता है उस सौर वर्ष में १३ चांदमास होते हैं । तब एक चान्द्रमास अधिमास या मलमास के नाम से छोड़ दिया जाता है। यदि ऐसा न किया जाय तो चांद मास के अनुसार मनाये जानेवाले त्योहार, पर्व इत्यादि भिन्न-भिन्न ऋतुओं में मुसलमानी त्यौहारों की तरह पड़ने लगें । ऊपर के श्लोक में यह बतलाया गया है कि एक महायुग में जितने सौरमास होते हैं उनसे चांदमासों की संख्या जितनी अधिक हो उतने ही चांदमास अधिमास के नाम से छोड़ दिये जायँगे । इसलिए एक महायुग में अधिमासों की संख्या । = महायुगीय चांदमास—महायुगीय सौरमास = (५,३४,३३,३३६ — ४३,२०,०००) X १२ = १५,६३,३३६ सावनाहानि चान्द्रेभ्यो द्युभ्यः प्रोज्झ्य तिथिक्षयाः । उदयादुदयं भानोर्भूमिसावनवासराः ॥ ३६ ॥ अनुवाद—एक महायुग में जितनी चान्द्र तिथियाँ होती हैं उस संख्या में से महायुग के सावन दिनों की संख्या घटाने से उन तिथियों की संख्या निकल आती है जो क्षय होती है अर्थात् जिनकी गणना नहीं की जाती । सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय के बीच के समय को भूमिसावन दिन कहते हैं ॥३६॥ विज्ञान भाष्य—एक चांदमास में ३० तिथियाँ होती हैं इसलिए यदि महायुगीय चांदमासों की संख्या को ३० से गुणा कर दिया जाय तो एक महायुग में कितनी तिथियां होती हैं यह मालूम हो जाय । यह पहले ही बतलाया गया है कि एक महायुग में कितने सावन दिन होते हैं और एक सावन दिन में एक ही तिथि की गणना होती है, इसलिए सावन दिनों की संख्या से तिथियों की संख्या जितनी अधिक होती हैं उतनी तिथियों की गणना नहीं की जाती; इसलिए यह क्षय या अवम तिथियाँ कहलाती हैं । इस श्लोक के उत्तरार्द्ध की व्याख्या कई बार की जा चुकी है। यहाँ केवल यह अधिक बतलाया गया है कि सावन दिन को भूमिसावन दिन भी कहते हैं । वसुद्वयष्टशरिद्र्वङ्कसप्ताद्रितिथयो युगे । चान्द्राः खाष्टखव्योमवाग्निखर्तुनिशाकराः ॥३७॥ षड्वह्नित्रिहुताशाङ्कतिथयश्चाधिमासकाः । तिथिक्षया यमार्थश्विद्व्यष्टव्योमशराश्विनः ॥३८॥
मध्यमाधिकार ३१ खचतुस्कसमुद्राष्टकुपञ्च रविमासकाः । भवन्ति भोदया भानुभगणैरूनिताः कहाः ॥३६॥ अनुवाद—( ३७) एक महायुग में १,५७,७६,१७,८२८ सावन दिन; १,६०,३०,००,०८० चान्द्र दिन अर्थात् तिथियाँ; (३८) १५,६३,३३६ अधिमास; २,५०,८२,२५२ क्षय तिथियाँ तथा (३६) ५,१८,४०,०४० सौर मास होते हैं । नक्षत्र के उदय में से सूर्य के भगण की संख्या घटाने से भूमिसामन दिन होते हैं ॥३७-३६॥ विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में जो संख्याएँ दी गयी हैं वह इनसे पहले के तीन श्लोकों के उदाहरण हैं । ऊपर जो महायुगीय अंक दिये गये हैं वह सब सिद्धान्तों में एक से नहीं हैं । थोड़ा बहुत अन्तर पाया जाता है । एक महायुग में सावन दिनों की संख्या भिन्न- भिन्न सिद्धान्तों में जैसी मिलती है वह नीचे की सारिणी से सहज ही जानी जा सकती है :— प्रचलित सूर्य सिद्धान्त के मत से १,५७,७६,१७,८२८ पंचसिद्धान्ति के सूर्य सिद्धान्तके मत से १,५७,७६,१७,८०० आर्यभटीय के मत से १,५७,७६,१७,५०० ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त, सिद्धान्त शिरोमणि के मत से १,५७,७६,१६,४५० महासिद्धान्त के मत से १,५७,७६,१७,५४२ अधिमासोनरात्र्यक्षंचान्द्रसावनवासराः । एते सहस्रगुणिताः कल्पे स्युर्भगणादयः ॥४०॥ अनुवाद—अधिमासों, अवम तिथियों, नाक्षत्र, चान्द्र और सावन दिनों तथा ग्रहों के भगणों की जो संख्याएँ (बतलायी गयी) हैं उनका एक हजार गुना कर देने से कल्प की संख्याएँ निकल आती हैं ॥ ४० ॥ विज्ञान भाष्य—१००० महायुगों का एक कल्प होता है इसलिए महायुगीय भगण इत्यादि की संख्याओं को १००० से गुणा कर देने पर कल्प की संख्याएँ जानी जा सकती हैं । प्राग्गतेःसूर्य मन्दस्य कल्पे सप्ताष्टवह्नयः । कौजस्य वेदखयमा बुधस्याष्टर्तुवह्नयः ॥४१॥ खखरन्ध्राणि जैवस्य शौक्रस्यार्थगुणासवः । गोऽनयश्शनिमंदस्य पातानामथ वामतः ॥४२॥
३२ सूर्य सिद्धान्त मनुदस्त्रास्तु भौजस्य बौधस्याष्टाऽष्टसागराः । कृताद्रिचन्द्रा जैवस्य त्रिलाङ्काश्व भृगोस्तथा ॥४३॥ शनिपातस्य भगणाः कल्पे यमरसर्तवः । भगणाः पूर्वमेवाऽत्र प्रोक्ताः चन्द्रोच्चपातयोः ॥४४॥ अनुवाद—(४१) पूर्व की ओर चलते हुए एक कल्प में सूर्य का मन्दोच्च ३८७ भगण, मङ्गल का मन्दोच्च २०४ भगण, बुध का मन्दोच्च ३६८ भगण, (४२) वृहस्पति का मन्दोच्च ६०० भगण, शुक्र का मन्दोच्च ५३५ भगण और शनि का मन्दोच्च ३६ भगण करता है । पातों की गति पश्चिम की ओर को होती है । एक कल्प में मङ्गल का पात २१४ भगण, बुध का पात ४८८ भगण, वृहस्पति का पात १७४ भगण, शुक्र का पात ६०३ भगण और (४४) शनि का पात ६६२ भगण करता है । चन्द्रमा के उच्च और पात के भगणों की संख्या पहले (३३वें श्लोक में) बतलायी जा चुकी है । विज्ञान भाष्य—ग्रहों के मन्दोच्चों और पातों की गति बहुत सूक्ष्म होती है । इनमें से कोई भी १ महायुग में १ पूरा चक्कर नहीं कर पाते, इसलिए इनकी संख्या कल्प के अनुसार दी गयी है । मन्दोच्च और पात किसे कहते हैं इसका विवेचन चन्द्रमा के उच्च और पात के साथ किया गया है। यह संस्थाएँ कैसे जानी गयीं, इसका स्पष्ट प्रमाण कहीं नहीं मिलता; परंतु इसमें संदेह नहीं कि इसकी जानकारी बहुत काल के पर्यवेक्षण से की गयी होगी। कुछ पाश्चात्य विद्वान कहते हैं कि इसका ज्ञान भारतीय ज्योतिषियों को यूनानियों से हुआ होगा; परंतु यह उनका भ्रम है जैसा कि नीचे की सारिणी से जान पड़ेगा । यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि इन भगणों की संख्या आजकल के सूक्ष्मयंत्रों से जाने गये अंकों से बहुत भिन्न है । आधुनिक ग्रन्थों में इन मन्दोच्चों और पातों की वार्षिक गति दी हुई है; इसलिए सूर्य सिद्धान्त के कल्पीय भगणों से वार्षिक गति का मान निकाल कर तुलना की जा सकती है । वार्षिक गति इस प्रकार निकाली गयी :—कल्प में जितने भगण होते हैं उसको कल्प के सौर-वर्ष से भाग दे दिया गया तो भगण की एक भिन्न संख्या प्राप्त हुई । इसको ३६० से गुणा करने पर अंश, अंश को ६० से गुणा करने पर कला और कला को ६० से गुणा करने पर विकला में वार्षिक गति निकल आयी । जैसे सूर्य-मन्दोच्च एक कल्प में ३८७ भगण करता है तो एक वर्ष में वह ३८७ X ३६० X ६० X ६० / ४३२००००००० विकला अर्थात् ११६१ / १०००० विकला अर्थात् ॰११६१ विकला चलेगा ।
मध्यमाधिकार ३३ इसी प्रकार अन्य ग्रहों के मन्दोच्चों तथा पातों की वार्षिक गति विकला में जानी जा सकती है। इस सारिणी के जिन अंकों के पहले धन का चिह्न (+) है उससे यह प्रकट होता है कि गति पूर्व की ओर है और जिन अङ्कों के पहले ऋण का चिह्न (-) है उससे प्रकट होता है कि गति पश्चिम की ओर है। दूसरे स्तम्भ में जो अंक दिये गये हैं वह सायन-मेष के विचार से दिये गये हैं अर्थात् उनसे यह प्रकट होता है कि सायन-मेष से (वसंत सम्पात से) ग्रहों के मन्दोच्चों और पातों का अन्तर प्रति वर्ष कितना होता जाता है । परन्तु सायन-मेष चल है। यह प्रति वर्ष ५०·२६ विकला पच्छिम की ओर हटता जाता है; इसलिए यदि निरयन-मेष से जो स्थिर है मन्दोच्चों और पातों का वार्षिक अन्तर जानना हो तो दूसरे स्तम्भ के अंकों से ५०.२६ विकला घटा देना चाहिये । ऐसा करने से जो अन्तर आवेंगे वह निरयन-मेष से मन्दोच्चों और पातों के वार्षिक अन्तर होंगे। ऐसा करने से देखा जाता है कि शुक्र के मन्दोच्च की गति पश्चिम की ओर है अर्थात् शुक्र का मन्दोच्च तारों के मध्य पूर्व न जाकर पश्चिम की ओर खिसक रहा है। हमारे व्यावहारिक ज्योतिष ग्रन्थों में अयन चलन ६० विकला माना गया है। क्योंकि हमारा वर्षमान वास्तविक नाक्षत्र-वर्ष से ८॥ विकला अधिक है; इसलिए यदि वसंत सम्पात की वार्षिक गति ६० विकला मानी जाय और दूसरे स्तम्भ में जो अंक दिये गये हैं उनमें से ६० विकला घटायी जाय तो जो अन्तर आता है वही चौथे स्तम्भ में लिखा गया है। इस स्तम्भ में जो अंक आये हैं उनकी तुलना सूर्य सिद्धान्तीय अङ्कों से करनी चाहिये । मन्दोच्चों और पातों की वार्षिक गति ग्रह आधुनिक सूक्ष्म* बेधों के अनुसार सायन-मेष वास्तविक हमारे सिद्धा- सूर्य सिद्धान्त के या वसंत निरयन- न्तों के अनुसार संपात से मेष से निरयन-मेष से १ २ ३ ४ ५ मन्दोच्च विकला विकला विकला विकला रवि +६१.५ +११.२४ +१.५ +०.११६१ मंगल +६५.७ +१५.४६ +५.७ +०.०६१२ *Loomis की Practical Astronomy से लिया गया भारतीय ज्योतिः शास्त्र पृष्ठ २०७ ३
३४ सूर्य सिद्धान्त १ २ ३ ४ ५ बुध +५६.१ +५.२१ -३.६ : +•११०४ गुरु +५६.६ +६.६५ -३.१ +•२७ शुक्र +४७.० -३.२४ -१३.० +•१६०५ शनि +६६.६ +१६.३१ +६.६ +•०११७ मंगल का पात +२५.० -२५.२२ -३५.० -०.०६४२ बुध ,, +४०.२ -१०.०७ -१६.८ -•१४६४ गुरु ,, +३४.३ -१५.६० -२५.७ -•०५२२ शुक्र ,, +२६.७ -२०.५० -३०.३ -•२७०६ शनि ,, +३०.७ -१६.५४ -२६.३ -•१८६६ इस सारिणी के ४थे और ५वें स्तम्भों में बहुत अन्तर है । परन्तु यहाँ यह ध्यान रखना चाहिये कि ५वें स्तम्भ में जो कुछ लिखा गया है वह कोरी आंख से और स्थूल यंत्रों से जाना गया है । यदि इन सिद्धान्तों के मानों की तुलना यूनानियों के मानों से की जाय तो जान पड़ेगा कि हमारे सिद्धान्तकार कितनी सूक्ष्म परीक्षा करते थे (देखिए ३५वें पृष्ठ की सारिणी) । ४थे और ७वें स्तम्भों के अंकों को मिलाने से जान पड़ेगा कि हमारे सिद्धान्त- कार वास्तविक स्थिति से कितना निकट थे और टालमी कितनी दूर । केरोपन्त ने जो गणना की है वह आधुनिक मानों के अनुसार है, इसलिए इनकी गणना से मन्दोच्चों और पातों की वास्तविक स्थिति का पता लगता है । इस तुलना से यह भी प्रकट है कि हमारे सिद्धान्तकारों ने स्वतंत्र अनुभव से इन सब भगण-मानों को जाना था न कि यूनानियों या अन्य देशवालों से लिया था जैसा कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों का मत है । षण्मनूनां च संपिण्ड्य कालं तत्सन्धिभिस्सह । कल्पादिसन्धिन सार्धं वैवस्वतमनोस्तथा ॥४५॥ युगानां त्रिघनं यातं तथा कृतयुगं त्विदम् । प्रोज्झ्य सृष्टेस्ततः कालं पूर्वोक्तं दिव्यसंख्यया ॥४६॥ सूर्याब्दसंख्यया ज्ञेयाः कृतस्याऽन्ते गता अमी । खचतुष्टयसप्ताद्रयग्निशरनन्दनिशाकराः ॥४७॥ अनुवाद—(४५) छः मनुओं, उनकी छः सन्धियों और कल्प की आदि संधि के काल को जोड़कर योगफल में वैवस्वत मनु के (४६) २७ युगों को तथा इस (अट्ठाईसवें) सत्ययुग को जोड़ दो और उसमें से सृष्टि के रचने में (२४वें श्लोक में) पहले कहे के अनुसार जितना समय लगा है उसको घटा दो । (४७) जो शेष बचे
मध्यमाधिकार ३५ | मन्दोच्चों और पातों के स्थान | | | | सम्वत् २०५ वि० में मन्दोच्चों और पातों के स्थान (सायन) | | | | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | | | केरोपंत की गणना के अनुसार | सूर्य सिद्धान्त के अनुसार | अन्तर | केरोपंत की गणना से | तालमी की गणना से | अन्तर | | | राशि अंश कला | रा० अं० क० | अं० क० | रा० अं० कला | रा० अं० क० | अं० क० | | रवि का उच्च | २ १७ ७ | २ १७ १५ + | ० ८ | २ ११ ५ | २ ५ ३० | — ५ ३५ | | मंगल " | ४ ८ ११ | ४ १० १ + | १ ५० | ४ १ ३६ | ३ २५ ३० | — ६ ६ | | बुध " | ७ २४ १ | ७ १० २६ — | १३ ३५ | ७ १८ ३२ | ६ १० ० | — ३८ ३२ | | गुरु " | ५ २० ३८ | ५ २१ १६ + | ० ३८ | ५ १५ ७ | ५ ११ ० | — ४ ७ | | शुक्र " | ६ २१ ३ | २ १६ ४६ — | २११ १४ | ६ १६ १८ | १ २५ ० | — २३१ १८ | | शनि " | ८ ५ १२ | ७ २६ ३७ — | ८ ३५ | ७ २८ ४५ | ७ २३ ० | — ५ ४५ | | मंगल का पात | १ ८ ६ | १ १० ५ + | १ ५६ | १ ५ २६ | ० २५ ३० | — ६ ५६ | | बुध " | १ ० १८ | ० २० ५४ — | ९ ३४ | ० २६ ५ | ० १० ० | — १६ ५ | | गुरु " | २ २५ ३० | २ १६ ४१ — | ५ ४६ | २ २२ १ | १ २१ ० | — ३१ १ | | शुक्र " | २ ३ ४० | १ २६ ४६ — | ३ ५४ | २ ० ३६ | १ २५ ० | — ५ ३६ | | शनि " | ३ १० १३ | ३ १० २५ + | ० १२ | ३ ७ २८ | ६ ३ ० | + ८५ ३२ | भारतीय ज्योतिषःशास्त्र पृ० २०५, २०६
३६ सूर्य सिद्धान्त वही (वर्तमान) सत्ययुग के अन्त तक सौर वर्षों में संख्या हुई जो १,६५,३७,२०,००० है ॥४५-४७॥ विज्ञान भाष्य—पिछले २२वें और २३वें श्लोकों में जो कुछ कहा गया है यही यहाँ फिर दुहराया गया है। इन श्लोकों के विज्ञान-भाष्य में कल्प के आरम्भ से वर्तमान महायुग के सत्ययुग के अन्त तक के सौर वर्षों की संख्या जानने की रीति बतलायी गयी है जो १,६७,०७,८४,००० होती है। इसमें से सृष्टि के रचने के १,७०,६४,००० सौर वर्ष घटा दिये जाँय तो शेष १,६५,३७,२०,००० होता है। इतने ही सौर वर्ष सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अन्त तक बीते हैं। अत ऊर्ध्वममी .युक्तै। गतकालाब्दसङ्ख्यया । मासीकृता युता मासैःमधु शुक्लादिभिर्गतैः ॥४८॥ पृथक्स्थास्तेऽधिमासघ्नाः सूर्यमासविभाजिताः । लब्धाधिमासकैर्युक्ता दिनीकृत्य दिनान्विताः ॥४६॥ द्विष्ठास्तिथिक्षयाभ्यस्ताश्चान्द्रवासरभाजिताः । लब्धोनरात्रिरहिता लङ्कायामर्धरात्रिकः ॥५०॥ अनुवाद—(४८) ऊपर बतलाये गये (सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अंत तक के) सौर वर्षों में सत्ययुग के उपरान्त जितने सौर वर्ष बीते हों उनको जोड़ लो । योगफल इष्टकाल तक के सौर वर्षों की संख्या होगी । इसके मास बना लो अर्थात् १२ से गुणा कर दो । मासों की संख्या में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से इष्टकाल तक जितने मास बीते हों उनको भी जोड़ दो । (४६) इस संख्या को दो स्थानों पर रखो, एक को महायुग के अधिमासों की संख्या से गुणा कर महायुग के सौर मासों की संख्या से भाग दे दो, जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक के अधिमासों की संख्या होगी । इस लब्धि को दूसरे स्थान में रखे हुए मासों में जोड़ दो । योगफल सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक के चांद्र-मासों की संख्या है। इसको ३० से गुणा कर (चान्द्र) दिन अर्थात् तिथियाँ बना लो और इष्टकाल तक वर्तमान मास की जितनी तिथियाँ बीती हों उनको जोड़ लो तो सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक जितनी तिथियाँ बीती हैं वह मालूम हो जायँगी । (५०) इन तिथियों की संख्या को भी दो स्थानों पर रखो । एक को महायुगीय क्षय-तिथियों की संख्या से गुण दो और गुणनफल को महायुगीय तिथियों की संख्या से भाग दे दो, जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से इष्टकाल तक की क्षय-तिथियों की संख्या हुई । इसको दूसरे स्थान में रखी हुई तिथियों की संख्या में से घटा दो, जो शेष हो उससे एक कम लङ्का की अर्द्ध-रात्रि तक सावन-दिनों की संख्या हुई ॥४८-५०॥
मध्यमाधिकार ३७ विज्ञान भाष्य-जब यह जानना होता है कि किसी इष्ट समय ग्रहों के स्थान क्या हैं तब सबसे पहिले यह जानना चाहिये कि सृष्टि के आदि से उस इष्ट समय तक कितने सावन दिन बीते । जब सावन दिनों की संख्या मालूम हो गयी तब त्रैराशिक के द्वारा ग्रहों का स्थान जान लेना सुगम होता है। क्योंकि सृष्टि के आदि में सब ग्रह एक साथ थे और एक महायुग में वह कितने भगण करते हैं तथा कितने सावन दिन होते हैं, यह भी बतला दिया गया है; इसलिए जब महायुगीय सावन दिनों में अमुक भगण होते हैं तब इष्टकाल तक के सावन दिनों में कितने भगण होंगे, यह जान लेने से ही ग्रह का स्थान निकल आता है। इष्टकाल तक के सावन दिनों की संख्या जिसे अहर्गण कहते हैं जानने की रीति ऊपर के तीन श्लोकों में बतलायी गई है। उदाहरण—१६७६ विक्रमीय की वसंत पंचमी (माघ सुदी ५) तक सृष्टि से कितने दिन बीते ? सृष्टि के आदि से सत्ययुग के अंत तक = १,६५,३७,२०,००० सौर वर्ष त्रेता ,, ,, = १२,६६,००० सौर वर्ष द्वापर ,, ,, = ८,६४,००० ,, १६७६ वि० की चैत्र शुक्ल १ के आरम्भ तक = ५,०२३* ,, इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ वि० के चैत्र शुक्ल १ के आरम्भ तक = १,६५,५८,८५,०२३ वर्ष = २३,४७,०६,२०,२७६ सौरमास* चै० शु० १ से माघ शु० १ के आरंभ तक = १० चांद्रमास इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ के मा० शु० १ तक = २३,४७,०६,२०,२८६ मध्यम मास जब एक महायुग में ५,१८,४०,००० सौर मास होते हैं तब १५,६३,३३६ अधिमास होते हैं; इसलिए २३,४७,०६,२०,२८६ मध्यम मासों में अधिमासों की संख्या हुई $\frac{२३,४७,०६,२०,२८६\times१५,६३,३३६}{५,१८,४०,०००} = ७२,१३,८४,७२६ अधिमास$ इसलिए सृष्टि के आदि से १६७६ वि० की माघ शु० १ तक हुए २४,१९,२०,०५,०१२ चांद्रमास = ७,२५,७६,०१,५०,३६० तिथियाँ ∵ माघ सुदी ५ तक हुईं ७,२५,७६,०१,५०,३६५ तिथियाँ
- १६७६ वि० में जिस समय मेष-संक्रान्ति लगेगी उस समय पूरे होंगे । इसलिए इन्हें मध्यम सौर वर्ष या मास कहना चाहिये ।
३८ सूर्य सिद्धान्त परन्तु एक महायुग में ५३४३३३३६ चान्द्रमास तथा २,५०,८२,२५२ क्षय तिथियाँ होती हैं, इसलिए २४,१६,२०,०५,०१२ चान्द्र*मासों में क्षय तिथियों की संख्या = (२४,१६,२०,०५,०१२ × २,५०,८२,२५२) / ५३४३३३३६ = ११,३५,६०,१८,७६१ ∵. माघ सुदी ५, तक सृष्टि के आदि से सावन दिनों की संख्या = ७,१४,४०,४१,३१,६०४ माघ सुदी ५ के पहले की अर्द्धरात्रि तक के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,६०३ किसी समय तक के सावन दिनों की संख्या जानने का यह नियम बहुत कष्टप्रद है और तनिक सी भी भूल हो जाने से घंटों का परिश्रम व्यर्थ जाता है। इसलिए व्यवहार में इतने बड़े समय की गणना नहीं की जाती वरन् करण ग्रन्थ और सारणियाँ बनी हुई हैं जिनके द्वारा यह गणना सहज ही हो जाती है। आगे चलकर इस पुस्तक में भी सत्ययुग के अन्त से अहर्गण बनाने का उपदेश दिया गया है। यदि स्वतन्त्र गणना सुगम रीति से करना हो तो नीचे लिखी रीति काम दे सकती है :— यह बतलाया जा चुका है कि एक महायुग में ४३,२०,००० सौर वर्ष तथा, १,५७,७६,१७,८२८ सावन दिन होते हैं। इसलिए एक सौर वर्ष में १,५७,७६,१७,८२८ / ४३,२०,००० सावन-दिन अर्थात् ३६५.२५८७५६४८१५ सावन-दिन होते हैं। जिस समय तक के अहर्गण की संख्या जाननी हो वह जिस सम्वत् में हो उसकी मेष संक्रान्ति के दिन का अहर्गण निकाल लो। ऐसा करने के लिए एक वर्ष के सावन दिनों की संख्या को सृष्टि के आदि से इष्ट सम्वत् तक के सौर वर्षों से गुणा कर दो। उपर्युक्त उदाहरण में १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के दिन सृष्टि के आदि से १,६५,५८,८५,०२३ सौर वर्ष बीते हैं; इसलिए इस सम्वत् के मध्यम मेष-संक्रान्ति के समय तक ३६५.२५८७५६४८१५ × १,६५,५८,८५,०२३ सावन दिन अर्थात् ७,१४,४०,४१,३१,३२१. ७७००२६०७४५ सावन दिन बीते। परन्तु स्पष्ट मेष- संक्रान्ति मध्यम संक्रान्ति से २.१७०६६४४ सावन दिन पहले ही हो जाती है। इसलिए यदि मध्यम मेष संक्रान्ति तक के अहर्गण में से २.१७०६६४४ सावन दिन घटा दिये जांय तो स्पष्ट मेष-संक्रान्ति के समय तक ७,१४,४०,४१,३१,३१६.५६६३- *पुस्तक में चन्द्र मासों की जगह तिथियां कही गयी हैं जिससे गणना शुद्ध होती है; परन्तु गुणा भाग अधिक करना होता है इसलिए चान्द्र मास लिये गये हैं। इससे सम्भव है कि एक दिन की भूल पड़े, जो वार निकालने से शुद्ध हो सकती है।
मध्यमाधिकार ३६ ३१६७४५ सावन दिन बीते। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि सृष्टि के आदि से इतने मध्यम सावन दिन बीतने पर १८७६ वि० की मेष संक्रान्ति लंका में हुई। इसलिए जिस दिन मेष संक्रान्ति थी उस दिन की आधी रात तक के अहर्गण हुए ७,१४,४०,४१,३१,३२० । अब देखना चाहिये कि मेष की संक्रान्ति से कितने दिन पर बसंत पंचमी पड़ी । इसके लिए पहले यह जानना चाहिये कि मेष संक्रान्ति के दिन कौन तिथि थी । १ चान्द्रमास २९.५३०५८७६४६०७ सावन दिनों का होता है । इसलिए यदि मेष संक्रान्ति के अहर्गण को इतने सावन दिनों से भाग दे दिया जाय तो जो लब्धि आवेगी वह सृष्टि के आदि से मेष संक्रान्ति तक के बीते हुए चान्द्रमासों की संख्या होगी और जो शेष बचा है वह चालू चान्द्रमास के सावन दिन होंगे । इस शेष को यदि ३० से गुणा करके गुणनफल को चान्द्रमास के सावन दिनों से फिर भाग दिया जाय तो जो लब्धि आवेगी वह तिथियों की संख्या होगी । ऐसा करने से मेष संक्रान्ति के समय तिथि की संख्या १६५२५७६ आती है, जो पूर्णिमान्त गणना से वैशाख बदी २ और अमान्त गणना से चैत बदी २ होती है । अब यह जानना चाहिये कि वैशाख बदी २ से माघ सुदी ५ तक कितने सावन दिन बीते । इसलिए पहले यह देखना चाहिये कि इस समय में कितनी तिथियाँ बीतीं । वैशाख बदी ३ से माघ बदी २ तक ९ चान्द्रमास होते हैं, क्योंकि इस वर्ष कोई मलमास नहीं पड़ा, तथा माघ बदी ३ से माघ सुदी ५ के आरम्भ तक अर्थात् चौथ के अन्त तक १७ तिथियाँ होती हैं । इसलिए मेष संक्रान्ति से माघ सुदी ४ के अन्त तक ९ x ३० + १७ तिथियाँ अर्थात् २८७ तिथियाँ बीतीं । परन्तु ३० तिथियाँ = २९.५३०५८७६४६०७ मध्यम सावन दिन; इसलिए २८७ तिथियाँ = २८७ x २९.५३०५८७६४६०७ x १/३० = २८२.५०६२६१३५०७३६ = २८२.५१ सावन दिन स्थूल रूप से परन्तु मेष संक्रान्ति की अर्द्धरात्रि के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,३२० इसलिए सृष्टि से माघ सुदी ५ तक के अहर्गण = ७,१४,४०,४१,३१,६०२.५१ अर्थात् माघ सुदी ५ की पहली अर्द्ध-रात्रि तक ७,१४,४०,४१,३१,६०३ सावन दिन बीते; जो पहली रीति से निकाले गये अहर्गण से मिलता है। इस गणना के लिए दशमलव के ग्यारहवें स्थान तक के अंकों को लेना पड़ता है क्योंकि गुणक (सृष्टि से
४० सूर्य सिद्धान्त अब तक के सौर वर्षों की संख्या) अरबों में है। यदि त्रेता या कलियुग के आदि से अहर्गण निकालना हो जिसके लिए आगे आदेश है, तो चान्द्रमास और सौर वर्ष के सावन दिनों की संख्या सात दशमलव स्थानों तक लेना पर्याप्त होगा । अब यह परीक्षा करना रह गया कि यह संख्या शुद्ध है या नहीं । इसके लिए केवल यह जाँचना पर्याप्त होगा कि सृष्टि से इतने दिनों के बाद कौन वार आरम्भ होगा । यदि वार ठीक निकल आवे या १ दिन का अन्तर पड़े तो समझना चाहिए कि अहर्गण ठीक है, नहीं तो अशुद्ध है । इसकी रीति आगे के श्लोक में दी हुई है ! सावनो द्युगणस्सूर्याद्दिनमासाब्दपास्ततः । सप्तभिः क्षयितश्शेषः सूर्याद्यो वास्रेश्वरः ॥५१॥ मासाब्ददिनसंख्याप्तौ द्वित्रिघ्नौ रूपसंयुतौ । सप्तोद्धृतावशेषौ तु विज्ञेयौ मासवर्षपौ ॥५२॥ अनुवाद-(५१) सावन दिनों की जो संख्या हो उससे दिनपति, मास- पति और वर्षपति सूर्य से गिनकर जानना चाहिये । इस संख्या को ७ से भाग दे दे जो शेष बचे वही सूर्य से वारों के क्रम से आरंभ होकर दिनपति है । (५२) यदि इस (सावन दिनों की) संख्या को क्रम से मास और वर्ष के दिनों की संख्याओं से भाग दे दें और भागफलों को क्रम से दो और तीन से गुणा करके, प्रत्येक गुणनफल में एक जोड़ दे और योगफलों को ७ से भाग दे दें तो जो शेष बचे वही सूर्य से वारों के क्रम से आरंभ हो कर क्रमानुसार मासपति और वर्षपति है ॥५१-५२॥ विज्ञान-भाष्य-वार ( दिन ) का नाम उस ग्रह के नाम पर रखा गया है जो वार के आरंभ में पहले घंटे ( होरा ) का स्वामी समझा गया है। जो ग्रह पहले घंटे का स्वामी होता है वही उस वार का भी स्वामी समझा जाता है। इसी तरह सावन* मास के आरंभ में जो वार पड़ता है उसी का स्वामी उस सावन मास का स्वामी समझा जाता है और सावन वर्ष के आरम्भ में जो वार पड़ता है उसी का स्वामी उस सावन वर्ष का स्वामी समझा जाता है। जैसे रविवार के पहले घंटे का स्वामी रवि, उस दिन का स्वामी रवि, जो सावन मास रविवार से आरंभ होता है उस मास का स्वामी रवि और जो सावन वर्ष रविवार से आरंभ होता है उस वर्ष का स्वामी भी रवि ही है । *सावन को श्रावण न समझना चाहिये । ३० सावन दिनों का जो मास होता है वह सावन मास और १२ सावन महीनों का जो वर्ष होता है वह सावन वर्ष कहलाता है ।
मध्यमाधिकार ४१ किस घंटे ( होरा ) का स्वामी कौन ग्रह है यह जानने के लिए वह क्रम समझ लेना चाहिये जिस क्रम से घंटे के स्वामी बदलते हैं। शनि ग्रह पृथ्वी से सब ग्रहों से अधिक दूर है, उससे निकट बृहस्पति है, बृहस्पति से निकट मंगल, मंगल से निकट सूर्य, सूर्य से निकट शुक्र, शुक्र से निकट बुध १ और बुध से निकट चन्द्रमा है। इसी क्रम से होरा के स्वामी बदलते हैं। यदि पहले घंटे का स्वामी शनि है तो दूसरे घंटे का स्वामी वृहस्पति, तीसरे का स्वामी मंगल, चौथे का सूर्य, पांचवें का शुक्र, छठें का बुध, सातवें का चन्द्रमा, आठवें का फिर शनि, इत्यादि क्रमानुसार हैं। परन्तु जिस दिन पहले घंटे का स्वामी शनि होता है उस दिन का नाम शनिवार होना चाहिये । इसलिए शनिवार के दूसरे घंटे का स्वामी बृहस्पति, तीसरे घंटे का स्वामी मंगल इत्यादि हैं। इस प्रकार सात-सात घंटे के बाद स्वामियों का वही क्रम फिर आरंभ होता है। इसलिए शनिवार के २२वें घण्टे का स्वामी शनि, २३वें का वृहस्पति, २४वें का मंगल, और २४वें के बाद वाले घंटे का स्वामी सूर्य होना चाहिये । परन्तु यह २५वां घंटा अगले दिन का पहला घंटा है जिसका स्वामी सूर्य है इसलिए शनिवार के बाद रविवार होता है। रविवार के दूसरे घंटे का स्वामी शुक्र, तीसरे का बुध, चौथे का चन्द्रमा, इत्यादि क्रमानुसार चलते हुए ११वें, १८वें २५वें घंटों का स्वामी भी चन्द्रमा होता है। परन्तु २५वां घंटा अगले दिन का पहला घंटा है इसलिए इसी घंटे के स्वामी के नाम से अगला दिन चन्द्रवार पड़ा। इसी प्रकार और वारों का नामकरण २ हुआ है। अब यह स्पष्ट हो गया कि शनिवार के बाद रविवार और रविवार के बाद सोमवार और सोमवार के बाद मंगलवार क्यों होता है। ग्रहों के क्रम में शनि से रवि चौथा ग्रह है, रवि से चंद्रमा चौथा ग्रह है, चन्द्रमा से मंगल चौथा ग्रह है। इसलिए यह नियम हो गया है कि ग्रहों के क्रम को शनि से गिनते हुए प्रत्येक चौथा ग्रह अगले वार का स्वामी होता है। १. पृथ्वी से बुध शुक्र की अपेक्षा अधिक दूर है परन्तु हमारे ज्योतिष ग्रन्थों में शुक्र ही अधिक दूर माना गया है। कारण इसका यह है कि जो ग्रह जितनी ही दूर है उतनी ही देर में वह भगण पूरा करता है। ऐसा विश्वास हमारे ज्योतिषियों का भी है परन्तु इन्होंने पृथ्वी से यह दूरी ली है और आधुनिक ज्योतिषियों ने सूर्य से । २. वारों का यह क्रम प्रायः सभी देशों में पाया जाता है। परन्तु इनके नामकरण की उपपत्ति जैसी यहाँ की गयी है वैसी कहीं और भी है या नहीं यह खोजने के योग्य है ।
४२ सूर्य सिद्धान्त मासपति—यदि किसी सावन मास का पहला दिन रविवार हो तो अगले सावन मास का पहला दिन रविवार से ३१वाँ दिन होगा क्योंकि सावन मास ३० दिन का होता है । परन्तु रविवार से ३१वां दिन पांचवें सप्ताह का तीसरा दिन मंगलवार होता है । इसलिए दूसरे सावन मास का स्वामी मंगल ग्रह हुआ । तीसरे सावन मास का पहला दिन मंगलवार से ३१वां हुआ अर्थात् मंगलवार से आरम्भ करके पांचवें सप्ताह का तीसरा दिन, वृहस्पतिवार हुआ । इसलिए तीसरे सावन मास का स्वामी वृहस्पति हुआ । इसी प्रकार चौथे सावन मास का स्वामी, वृहस्पति- वार से तीसरे दिन शनिवार का स्वामी शनि और पांचवें सावन मास का स्वामी शनिवार से तीसरे दिन सोमवार का स्वामी सोम तथा छठें सावन मास का स्वामी बुध और सातवें सावन मास का स्वामी शुक्र हुआ । आठवें सावन मास से फिर यह क्रम चलेगा । इसलिए वारों के क्रम से तीसरा वार आने वाले सावन मास का पहला दिन तथा उसका स्वामी उस सावन मास का स्वामी होता है । अब यदि ध्यान से देखा जाय तो जान पड़ेगा कि मासपतियों का क्रम ग्रहों के क्रम के अनुसार इस प्रकार है— रवि, मंगल, वृहस्पति, शनि, सोम, बुध और शुक्र; फिर रवि, मंगल, वृहस्पति शनि इत्यादि । यदि चन्द्रमा से यह चक्र आरंभ हो तो इनका क्रम वही रहेगा जिस क्रम से ये पृथ्वी से क्रमानुसार दूर समझे गये हैं । वर्षपति—सावन वर्ष का आरम्भ जिस दिन से होता है उसी दिन का स्वामी उस वर्ष का स्वामी समझा जाता है । यदि पहले सावन वर्ष का आरम्भ रविवार को हो तो दूसरे सावन वर्ष का आरम्भ रविवार से ३६१वें दिन होगा जो ५१ सप्ताह के बाद वाले सप्ताह का चौथा दिन अर्थात् बुधवार है इसलिए दूसरे सावन वर्ष का स्वामी बुध होगा । तीसरे सावन वर्ष का आरम्भ दूसरे सावन वर्ष से ३६१वें दिन होगा इसलिए यह बुधवार से चौथा दिन शनिवार होगा जिसका स्वामी शनि है इसलिए तीसरे सावन वर्ष का स्वामी शनि होगा । इसी प्रकार चौथे सावन वर्ष का स्वामी शनिवार से चौथे दिन मंगलवार का स्वामी मंगल है । पाँचवें सावन वर्ष का स्वामी, मंगलवार से चौथे दिन शुक्रवार का स्वामी शुक्र है । छठें सावन वर्ष का स्वामी शुक्रवार से चौथे दिन सोमवार का स्वामी सोम, सातवें सावन वर्ष का स्वामी सोमवार से चौथे दिन वृहस्पतिवार का स्वामी वृहस्पति तथा आठवें सावन वर्ष का स्वामी वृहस्पतिवार से चौथे दिन रविवार का स्वामी रवि फिर होगा । इस तरह आठवें सावन वर्ष से फिर वही क्रम आरम्भ होगा । इन स्वामियों का क्रम इस प्रकार हुआ रवि, बुध, शनि, मंगल, शुक्र, सोम, वृहस्पति; फिर रवि, बुध, शनि इत्यादि । इसलिए यदि वारों के अनुसार क्रम मिलाया जाय तो आने वाले सावन वर्ष का
मध्यमाधिकार ४३ पहला दिन गत सावन वर्ष के पहले दिन से चौथा होगा । और यदि ग्रहों का क्रम मिलाया जाय तो शनि से आरम्भ करके प्रति तीसरा ग्रह वर्ष का स्वामी होता है । इन बातों को सूत्र रूप में भूगोलाध्याय के ७८वें और ७९वें श्लोकों में यों लिखा गया है :— मन्दादधःक्रमेण स्युश्चतुर्था दिवसाधिपाः । वर्षाधिपतयस्तद्वत्तृतीयाश्च प्रकीर्तिताः ।। ७८ ।। ऊर्ध्वक्रमेण शशिनो मासानामिधिपाः स्मृताः । होरेशाः सूर्यतनयादधोऽधः क्रमशस्तथा ।। ७९ ।। सूर्य सिद्धान्त, भूगोलाध्याय वर्षपति, मासपति, दिनपति और होरापति जानने की दोनों रीतियाँ दो चित्रों (चित्र ५ तथा ६) के द्वारा दिखलायी जाती हैं । वारों के अनुसार क्रम चित्र ५