सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
४४ सूर्य सिद्धान्त
वारों के नामों तथा वर्षपतियों और मासपतियों के सम्बन्ध का यह नियम जान लेने पर अब ५१वें और ५२वें श्लोकों की उपपत्ति सहज ही समझी जा सकती है । इष्टकाल तक जो अहर्गण ( सावन दिन ) आया हो उसको सात से भाग देने पर जो शेष बचे उतने ही दिन सप्ताह के बीत चुके हैं । सृष्टि का आरम्भ रविवार से हुआ इसलिए रविवार सप्ताह का पहला दिन है और शनिवार पिछला दिन अर्थात् सातवाँ दिन । इसलिए यदि शेष ५ बचे तो समझना चाहिए कि वृहस्पति का दिन है जिसकी मध्य रात्रि को वह अहर्गण पूरा होता है क्योंकि वृहस्पति सप्ताह का पाँचवाँ दिन है । जैसे पिछले उदाहरण में अहर्गण की जो संख्या ७,१४,४०,४१,३१,६०३ आयी है उसको सात से भाग देने पर शेष १ बचता है । इसलिए जिस दिन का अहर्गण निकाला गया है वह सप्ताह का पहला दिन रविवार है । परन्तु यह अहर्गण बसंत-पंचमी से पहले की अर्द्धरात्रि तक का है इसलिए बसंत-पंचमी को सोमवार होगा । मासपति जानने के लिए इष्ट अहर्गण को ३० से भाग देना चाहिए जो लब्धि आवे वही सृष्टि के आदि से सावन मासों की संख्या हुई । इन सावन मासों को दो से गुणा करके १ जोड़ दो और सात से भाग दे दो, क्योंकि मासपतियों का क्रम वार के अनुसार तीसरे दिन बदलता है और सात मास बीतने पर फिर वही क्रम आरम्भ होता है । जो शेष बचे, सप्ताह के उसी दिन का स्वामी उस मास का स्वामी होता है जो चल रहा है । जैसे ऊपर के अहर्गण को ३० से भाग देने पर २३, ८१,३४,७१,०५३ सावन मास और १३ सावन दिन होते हैं । इन सावन मासों की संख्या को २ से गुणा करके १ जोड़ने पर ४७,६२,६६,४२,१०७ होता है । इसको ७ से भाग देने पर शेष ३ बचता है । इसलिए चलते सावन मास का पहला दिन मंगलवार था । इसलिए इस मास का स्वामी मंगल है । वर्षपति जानने के लिए इष्ट अहर्गण को ३६० से अथवा ऊपर निकाले हुए सावन मासों को १२ से भाग दे दो, जो लब्धि आवे उतने ही सावन वर्ष बीते हैं । इनको तीन से गुणा करके १ जोड़ दो और सात से भाग दे दो क्योंकि वर्षपतियों का क्रम वार के अनुसार चौथे दिन बदलता है और सात वर्ष के बाद फिर वही क्रम आरम्भ होता है । जो शेष बचे (सप्ताह के) उसी दिन का स्वामी चलते सावन वर्ष का स्वामी होता है क्योंकि सप्ताह का आरम्भ रविवार से होता है । जैसे ऊपर के उदाहरण में अहर्गण को ३६० से भाग देने पर अथवा सावन मासों को १२ से भाग देने पर गत सावन वर्षों की संख्या १,६८,४४,५५,६२१ हुई ।
मध्यमाधिकार ४५ इसको तीन से गुणा कर १ जोड़ने से ५,६५,३३,६७,७३४ हुआ । इसको ७ से भाग देने पर शेष १ बचता है । इसलिए चलते सावन वर्ष का आरंभ रविवार को हुआ और इस वर्ष का स्वामी रवि हुआ । चित्र ६- पृथ्वी से ग्रहों की दूरी के अनुसार क्रम यह तो हुई सूर्य सिद्धान्त के अनुसार वर्षपति निकालने की रीति । आज- कल के सभी पंचांगों में वर्षपति (वर्षेश) उस दिन का स्वामी माना जाता है जिस दिन चैत्र शुक्ल प्रतिपदा होती है और वर्ष का मंत्री उस दिन का स्वामी समझा जाता है जिस दिन मेष संक्रान्ति होती है। मेघेश उस दिन का स्वामी होता है जिस दिन आर्द्रा नक्षत्र लगता है, इत्यादि इसी विचार से वर्ष भर का फल निकाला जाता है । मकरंद सारिणी में सूर्य सिद्धान्त से भिन्न नियम यह है:-- चैत्र शुक्ल प्रतिपद्दिवसे यो वारः स राजा । मेष संक्रान्ति दिवसे यो वारः स मंत्री । कर्क संक्रान्ति दिवसे यो वारः स सत्याधिपः । तुला संक्रान्ति दिवसे (यो) वारः स रसाधिपः । मृग संक्रान्ति दिवसे यो वारो (स) नीरसाधिपः । आर्द्राप्रवेश
४६ सूर्य सिद्धान्त दिवसे यो वारः स मेघाधिपः । धनुः संक्रान्ति दिवसे यो वारः स पश्चिमधान्याधिपः* ॥ सावन वर्ष तथा सावन मास का व्यवहार आजकल कहीं नहीं है । इसलिए वर्षाधिप और मासाधिप निकालने का जो नियम सूर्य सिद्धान्त में दिया गया है वह किस काम आता है यह मैं नहीं जानता । यदि कोई सज्जन जानते हों तो कृपया सूचित करें । तेरहवें श्लोक से, जैसा कि मैंने उसकी टिप्पणी में लिखा है, यह ध्वनि निकलती है कि यथार्थ वर्ष सौर वर्ष ही है । फिर सावन वर्ष और सावन मास के अनुसार वर्षपति और मासपति निकालने की क्या आवश्यकता है ? यथा स्वभगणाभ्यस्तो दिनराशिः कुवासरैः । विभाजितो मध्यगतो भगणादिग्रहो भवेत् ॥५३॥ एवं स्वशीघ्रमन्दोच्चा ये प्रोक्ताः पूर्वयायिनः । विलोमगतयः पातास्तद्वच्चक्राद्विशोधिताः ॥५४॥ अनुवाद—(५३) जितने अहर्गण आवें उनसे किसी ग्रह के महायुगीय भगण को गुणा कर दो और गुणनफल को महायुगीय सावन दिनों से भाग दे दो। जो लब्धि आवेगी उतने ही भगण उस ग्रह के (सृष्टि के आदि से) मध्यम गति के अनुसार पूरे हुए हैं । जो शेष बचे उसको १२ से गुणा करके फिर (महायुगीय सावन दिनों से) भाग देने से उस राशि की संख्या आवेगी जितनी राशियां वह ग्रह वर्तमान भगण में पूरा कर चुका है । अब जो शेष बचे उसको ३० से गुणा करके महायुगीय सावन दिनों की संख्या से भाग देने पर उन अंशों की संख्या निकल आवेगी जितने अंश वह ग्रह वर्त्तमान राशि में पूरा कर चुका है इत्यादि । (५४) इसी प्रकार पहले कहे हुए पूर्व की ओर चलने वाले शीघ्रों और मन्दोच्चों के स्थान भी जाने जा सकते हैं। पातों की गति उलटी (पच्छिम की ओर) होती है, इसलिए पातों की जो राशि अंश कला विकला आवें उनको पूरे चक्र में से अर्थात् १२ राशि में से घटा देने पर, जो शेष बचे वही पातों के स्थान हैं ॥ ५३-५४ ।। विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में वह रीति बतलायी गयी है जिससे किसी इष्ट समय में ग्रहों के मध्यम स्थान जाने जाते हैं । इसका संक्षेप में अर्थ यह है कि जब एक महायुग में (महायुगीय सावन दिनों में) ग्रह ऊपर कहे हुए भगण करता है तब इष्ट समय तक के सावन दिनों में कितने भगण करेगा । इसलिए त्रैराशिक की रीति से इस नियम को यों प्रकट कर सकते हैं :— महायुगीय सावन दिन : इष्ट अहर्गण :: महायुगीय भगणः इच्छित भगण
- वेंकटेश्वर प्रेस की १६६० वि० की छपी मकरंद सारिणी पृष्ठ ४७६
मध्यमाधिकार ४७ यदि 'स' को महायुगीय सावन दिन, 'अ' को इष्ट अहर्गण, 'भ' को महायुगीय भगण तथा 'भा' को अभीष्ट भगण माना जाय तो संक्षेप में इसको यों लिखेंगे :- भा = (अ × भ) / स यह एक भिन्न है, जिसको सरल किया जाय तो जो पूर्णाङ्क आवेगा वह ग्रह के उन भगणों की संख्या है जो उस समय तक पूरे हो चुके हैं और शेष भिन्न को १२ से गुणा करके सरल करने पर जो पूर्णाङ्क आवेगा वह गत राशि तथा फिर जो भिन्न होगी उसको ३० से गुणा करके सरल करने पर वर्तमान राशि के अंश निकलेंगे । यदि कला विकला भी जानना हो तो ६० से गुणा करके सरल करते जाना होगा । यह नियम सभी पूर्व चलने वाले ग्रहों, शीघ्रोच्चों और मन्दोच्चों के लिए लागू है। यदि किसी ग्रह के पातों का स्थान जानना हो तो ऊपर लिखी रीति से जो राशि, अंश, कला, विकला आवे उसे १२ राशियों में से घटा देना चाहिये क्योंकि पात की चाल उलटी होती है इसलिए वह उलटे क्रम से राशि चक्र पर चलेगा । यदि गणित से निकले कि अमुक पात 'भा' भगण पूरे करके २ राशि ३ अंश ५ कला पर है, तो इसे मेष के आदि बिन्दु से उलटा गिनना चाहिये अर्थात् मीन, कुंभ, और मकर के अंतिम बिंदु से ३ अंश ५ कला अर्थात् मकर के २६ अंश ५५ कला पर । इसलिए यदि १२ राशियों में २ राशि ३ अंश ५ कला घटाया जाय तो ९ राशि २६ अंश ५५ कला आवेगा जिसका अर्थ यह हुआ कि वह पात राशि चक्र की ९ राशियों के उपरान्त दसवीं राशि के २६ अंश ५५ कला पर है। द्वादशघ्ना गुरोर्याता भगणा वर्तमानकैः । राशिभिस्सहिताश्शुद्धाष्षष्ट्या स्युर्विजयादयः ॥५५॥ अनुवाद—बृहस्पति के गत भगणों को १२ से गुणा करके गुणनफल में वर्तमान भगण की जिस राशि में बृहस्पति हो उसकी क्रम संख्या को जोड़ दे, योगफल को ६० से भाग देने पर जो शेष बचे उसी क्रम संख्या का सम्वत्सर विजय से आरंभ होकर चल रहा है, ऐसा समझना चाहिये ॥ ५५ ॥ विज्ञान भाष्य—बृहस्पति मध्यम गति से जितने समय में एक राशि चलता है उसको सम्वत्सर कहते हैं। इसलिए वृहस्पति के एक भगण काल में (४३३२·३२०६ सावन दिनों में) बारह सम्वत्सर होते हैं और एक सम्वत्सर में ३६१·०२६७२ सावन दिन होते हैं। इसलिए यह स्पष्ट है कि सौर वर्ष की अपेक्षा संवत्सर ४·२३२०३ सावन दिन छोटा और सावन वर्ष से १·०२६७२ सावन दिन बड़ा होता है।
४८ सूर्य्य सिद्धान्त एक चक्र में ६० सम्वत्सर होते हैं जिनके नाम क्रम से यह हैं :— १ विजय २१ प्रमादी ४१ श्रीमुख २ जय २२ आनन्द ४२ भाव ३ मन्मथ २३ राक्षस ४३ युवा ४ दुर्मुख २४ अनल (नल) ४४ धाता ५ हेमलम्ब २५ पिंगल ४५ ईश्वर ६ विलम्ब २६ कालयुक्त ४६ बहुधान्य ७ विकारी २७ सिद्धार्थी ४७ प्रमाथी ८ शार्वरी २८ रौद्र ४८ विक्रम ९ प्लव २९ दुर्मति ४९ वृष १० शुभकृत ३० दुंदुभी ५० चित्रभानु ११ शोभन ३१ रुधिरोद्गारी ५१ सुभानु १२ क्रोधी ३२ रक्ताक्ष ५२ तारण १३ विश्वावसु ३३ क्रोधन ५३ पार्थिव १४ पराभव ३४ क्षय ५४ व्यय १५ प्लवंग ३५ प्रभव ५५ सर्वजित १६ कीलक ३६ विभव ५६ सर्वधारी १७ सौम्य ३७ शुक्ल ५७ विरोधी १८ साधारण ३८ प्रमोद ५८ विकृति १९ विरोधकृत ३९ प्रजापति ५९ खर २० परिधावी ४० अंगिरा ६० नन्दन वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में¹ संवत्सर चक्र का आरंभ विजय से न मानकर ३५वें सम्वत्सर प्रभव से माना है। यही प्रथा आजकल भी प्रचलित है। यह प्रथा कब से आरंभ हुई इसकी खोज करना आवश्यक है। ६० संवत्सरों के चक्र में कई छोटे-छोटे विभाग हैं जिनका आरंभ भी प्रभव से ही होता है। इनकी चर्चा मानाध्याय नामक अंतिम अध्याय में की जायगी । १. नवलकिशोर प्रेस से १८८४ ई० में प्रकाशित और पं० दुर्गाप्रसाद जी द्वारा अनुवादित पृष्ठ ६०— आद्यं धनिष्ठांशमभिप्रपन्नो माघे यदायात्युदयं सुरेज्यः । षष्ठ्यब्द पूर्वंः प्रभवः सनाम्ना प्रवर्तते भूतहितास्तदाब्दः ॥
मध्यमाधिकार ४६ जब यह जानना हो कि किसी इष्ट समय में कौन संवत्सर चल रहा है तब सबसे पहले ५३वें श्लोक के अनुसार यह जानना चाहिये कि उस समय वृहस्पति का मध्यम स्थान क्या है । सृष्टि के आदि से अहर्गण निकाल कर मध्यम ग्रह जानने की क्रिया बहुत कठिन है, इसलिए यदि कलियुग के आदि से अहर्गण साधा जाय तो अधिक सुभीता होगा; क्योंकि इस समय से भी विजय सम्वत्सर का आरंभ हुआ है । जो लोग दशमलव भिन्न की रीति जानते हों उनको अहर्गण की जगह सौर वर्षों से काम लेने में और भी सुभीता होगा । इस प्रकार मेष-संक्रान्ति के समय वृहस्पति का जो मध्यम स्थान होगा वह निकल आवेगा । जैसे मान लीजिये कि यह जानना है कि सम्वत् १६८१ विक्रमीय मेष संक्रान्ति के समय कौन सम्वत्सर वर्तमान होगा और वह कितने दिन तक रहेगा ? कलियुग के आरंभ से १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति तक ५०२५ सौर वर्ष बीत चुकेंगे । उस समय तक वृहस्पति कितने भगण पूरा करके किस राशि पर रहेगा, यह जान लेने से सम्वत्सर का पता चल जायगा । एक महायुग अर्थात् ४३,२०,००० सौर वर्षों में वृहस्पति के ३,६४,२२० भगण होते हैं; इसलिए ५०२५ सौर वर्षों में ३,६४,२२० × ५०२५ = --------------------- भगण ४३,२०,००० ३,६४,२२० × ५०२५ = --------------------- × १२ संवत्सर ४३,२०,००० = ५०८३.६०४१६६६६ संवत्सर होते हैं । जिसका अर्थ यह हुआ कि १६८१ वि० की मेष संक्रान्ति के समय ५०८४वां सम्वत्सर चल रहा है, उसका .६०४१६६६६ भाग बीत गया है और, .३९५८३३३४ भाग रह गया है । ६० संवत्सरों का एक चक्र होता है इसलिए ५०८४ को ६० से भाग देने पर ८४ लब्धि आती है और ४४ शेष होता है जिसका अर्थ यह हुआ कि कलियुग से ६० सम्वत्सरों का चक्र ८४ बार हो चुका है ८५वें चक्र का ४४वां सम्वत्सर धाता चल रहा है और मेष संक्रान्ति के समय उसका .३९५८३३... भाग बीतने को शेष है । यदि यह जानना हो कि धाता सम्वत्सर १६८१ विक्रमीय में कितने दिन तक रहेगा तो इस शेष को एक सम्वत्सर के सावन दिनों से अर्थात् ३६१.०२६७२ से गुणा कर देना चाहिये । ऐसा करने से गुणनफल १४२.५६८४ सावन दिन आता है, इसलिए १६८१ को मध्यम मेष संक्रान्ति के समय से १४२.५६८४ सावन दिन बीतने ४
५० सूर्य सिद्धान्त पर धाता का अंत और ईश्वर नामक सम्वत्सर का आरम्भ होगा । यह पहले बतलाया गया है कि स्पष्ट मेष संक्रान्ति मध्यम मेष संक्रान्ति से २.९७०७ सावन दिन पहले ही होती है; इसलिए स्पष्ट मेष संक्रान्ति से ३६.०७६६१ सावन दिन पर अथवा ३६ दिन ४६ घड़ी ८ पल ४० विपल पर ईश्वर का प्रवेश होगा । विस्तरेणैतदुदितं संक्षेपाद्व्यावहारिकम् । मध्यमानयनं कार्यं ग्रहाणामिष्टतो युगात् ॥५६॥ अस्मिन् कृतयुगस्यान्ते सर्वे मध्यगता ग्रहाः । विना तु पातमान्दोच्चान्मेषादौ तुल्यतामिताः ॥५७॥ मकरादौ शशाङ्कोच्चं तत्पातस्तु तुलादिगः । निरंशत्वं गताश्चान्येनोक्तास्ते मन्द चारिणः ॥५८॥ अनुवाद—(५६) ग्रहों के मध्यम स्थान जानने की रीति अब तक विस्तार के साथ कही गयी है; परन्तु व्यवहार के लिए इष्ट युग से ही यह काम संक्षेप में करना चाहिये । (५७) इस सत्ययुग के अंत में पातों और मन्दोच्चों को छोड़कर सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष के आदि में समान थे अर्थात् सातों ग्रह मेष के आरम्भ स्थान पर पहुँचे हुए थे । (५) चन्द्रमा का उच्च मकर राशि के आदि में तथा उसका पात (राहु) तुला के आदि में थे । अन्य ग्रहों के पात और मन्दोच्च मन्दगति के कारण किसी पूरे अंश पर नहीं थे; इसलिए इनके बारे में कुछ नहीं कहा जाता है । (५६—५८)॥ विज्ञान भाष्य—इस अध्याय के ४५-५० श्लोकों में ग्रहों के मध्यम स्थान निकालने की जो रीति बतलायी गयी है वह गणित विस्तार के कारण व्यवहारोपयोगी नहीं है जैसा कि दिये हुए उदाहरणों से स्पष्ट है । इसलिए सृष्टि के आदि से सत्य- युग के अंत तक के वर्षों का अहर्गण निकालने की कोई आवश्यकता नहीं है । वर्तमान युग का आरम्भ जबसे हुआ है तभी से इष्टकाल तक का अहर्गण ४८वें श्लोक के उत्तरार्द्ध और ४६-५० श्लोकों के अनुसार जानकर ग्रहों के मध्यम स्थान जान लेने चाहिये । जिस समय सूर्यांश पुरुष ने मय को सूर्य सिद्धान्त का उपदेश दिया है वह इसी अध्याय के दूसरे श्लोक के अनुसार सत्ययुग के अंत का समय है, इसलिए ५७वें श्लोक में त्रेता के आदि से अहर्गण बनाने का संकेत है और यह भी दिखलाया गया है कि इस समय सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष राशि के आदि में समान थे । इस नियम के अनुसार कलियुग में कलियुग के आदि से ही अहर्गण निकालने की रीति सुविधाजनक है जो आजकल प्रचलित भी है । जैसे त्रेता के आदि में सब ग्रहों के मध्यम स्थान मेष के आदि में समान थे वैसे ही कलियुग के आदि में भी मेष राशि के आदि में
मध्यमाधिकार ५१ समान थे; क्योंकि त्रेता के आदि से कलियुग के आदि तक आधा महायुग होता है जितने समय में सब ग्रह पूरे-पूरे भगण करते हैं । हाँ चन्द्रमा का उच्च एक महायुग में विषम भगण करने के कारण मकर के आदि में न होकर कर्क के आदि में था, परन्तु पात तुला के ही आदि में था । यह मत सूर्यसिद्धान्त का है। भास्कराचार्य १ के अनुसार कलियुग के आदि में सूर्य चन्द्रमा के सिवा अन्य ग्रहों के मध्यम स्थान यह थे :- मंगल बुध गुरु शुक्र शनि चंद्रोच्च राहु* राशि ११ ११ ११ ११ ११ ४ ५ अंश २६ २७ २६ २८ २८ ५ ३ कला ३ २४ २७ ४२ ४६ २६ १२ विकला ५० २६ ३६ १४ ३४ ४६ ५८ यहाँ तक तो वह रीति बतलायी गयी है, जिससे ग्रहों का मध्यस्थान लंका या उज्जैन की आधी रात के समय का निकलता है। आगे के श्लोकों में लंका के पूरब पच्छिम के देशों में आधी रात के समय ग्रहों का मध्य स्थान जानने की रीति बतलायी जायगी । योजनानि शतान्यष्टौ भूकर्णो द्विगुणानि तु । तद्वर्गतो दशगुणात्पदं भूपरिधिर्भवेत् ॥ ५६ ॥ अनुवाद-पृथ्वी का व्यास ८०० के दूने १६०० योजन है; इसके वर्ग का १० गुना करके गुणनफल का वर्गमूल निकालने से जो आता है वह पृथ्वी की परिधि है ॥ ५६ ॥ विज्ञान भाष्य—यदि पृथ्वी का व्यास 'व' मान लिया जाय तो इसकी परिधि = √व² × १० = व × √१० = व × ३·१६२३, जिससे सिद्ध होता है कि परिधि व्यास का ३·१६२३ गुना होती है । आजकल यह सम्बन्ध ३·१४१६ दशमलव के चार स्थान तक शुद्ध समझा जाता है जो ३·१६२३ से बहुत भिन्न है । परन्तु इससे यह न समझ लेना चाहिये कि सूर्यसिद्धान्तकार को व्यास और परिधि का ठीक- १. सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ ३२-३३; कलकत्ते की १८१५ ई० की छपी ।
- राहु की यह स्थिति कलकत्ते की छपी सिद्धान्त शिरोमणि में तथा म. म. पं० बापूदेव शास्त्री की संपादित सिद्धान्त शिरोमणि में लिखी है; परन्तु मेरी गणना से इसको ६ राशि २६ अंश ४७ कला २·४ वि० पर कलियुग के आरम्भ में होना चाहिये जो १२ राशियों में से ऊपर दी हुई स्थिति को घटाने से आती है ।
५२ सूर्य सिद्धान्त
ठीक सम्बन्ध मालूम नहीं था; क्योंकि दूसरे अध्याय में अर्द्धव्यास और परिधि का
अनुपात ३४३८ : २१६०० माना गया है, जिससे परिधि व्यास का ३.१४१३६ गुना
ठहरती है । इसलिए इस श्लोक में परिधि को व्यास का √१०, सुविधा के लिए,
गणित की क्रिया संक्षेप करने के लिए, माना गया है; जैसे आजकल जब स्थूल रीति
से काम लेना होता है तब कोई इसको २२/७ और कोई ३.१४ मानते हैं और जहाँ
बहुत सूक्ष्म गणना करने की आवश्यकता पड़ती है वहाँ दशमलव के पांच-पांच सात-
सात स्थानों तक इसको शुद्ध लेना पड़ता है ।
भिन्न-भिन्न सिद्धान्तों में इस सम्बन्ध का मान क्या लिया गया है यह नीचे
के अवतरण से जान पड़ेगा ।
सूर्यसिद्धान्त \ व्यास : परिधि व्यास : परिधि
ब्रह्मगुप्त१ } १ : √ १० अर्थात् १ : ३.१६२३
द्वितीय आर्यभट२ /
प्रथम आर्यभट३ २०००० : ६२८३२ ,, १ : ३.१४१६
द्वितीय आर्यभट२ \ २२ : ७ अर्थात् १ : ३.१४२८
भास्कराचार्य४ /
भास्कराचार्य४ १२५० : ३९२७ ,, १ : ३.१४१६
३४३८ कला को
त्रिज्या मानने से, जो
ब्राह्मस्फुट के सिवा > ६८७६ : २१६०० ,, १ : ३.१४१३६
सभी सिद्धान्तों में /
पाया जाता है । /
आजकल के सूक्ष्म गणित से १ : ३.१४१५९२७ .
भास्कराचार्य और द्वितीय आर्यभट ने दो प्रकार से व्यास और परिधि का
संबंध बतलाया है, एक सूक्ष्म तथा दूसरा स्थूल और व्यवहारोपयोगी । आगे व्यास
और परिधि के सम्बन्ध को π चिह्न से सूचित किया जायगा जैसी कि आज कल
प्रथा है अर्थात् यदि व्यास १ है तो परिधि π है, जब कि π का मान व्यवहार के
१. ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त गोलाध्याय श्लोक १५ ।
२. महासिद्धान्त पाटीगणिताध्याय श्लोक ८८, ६२ ।
३. आर्यभटीय पृष्ठ २६ श्लोक १०, (ब्रह्मप्रेस इटावा का छपा) ।
४. लीलावती पृष्ठ ५४ क्षेत्रव्यवहाराध्याय श्लोक ४० ।
मध्यमाधिकार ५३ अनुसार २२/७, ३.१४, ३.१४२, ३.१४१६ इत्यादि जैसा आवश्यक हो लिया जा सकता है । इस श्लोक में दूसरा शब्द 'योजन' बड़े महत्व का है । आजकल लोग योजन को साधारणतः चार कोस का समझते हैं परन्तु कोस का मान स्वयम् स्थिर नहीं है । किसी-किसी प्रान्त में कोस बहुत छोटा होता है और किसी प्रान्त में बहुत बड़ा । इसी प्रकार योजन का भी परिमाण स्थिर नहीं है । यही कारण है कि भिन्न-भिन्न सिद्धान्तों में भूपरिधि या भूव्यास के मान भिन्न-भिन्न अंकों में दिये हुए हैं । नीचे लिखे अवतरणों से प्रकट होगा कि सिद्धान्तों में भूव्यास के मान क्या दिये हुए हैं:— पंचसिद्धान्तिका के१ मत से भूव्यास १०१८ ८/६० योजन आर्यभट२ और लल्ल ,, ,, १०५० ,, वर्तमान सूर्यसिद्धान्त ,, ,, १६०० ,, सिद्धान्त शिरोमणि३ ,, ,, १५८१ १५/३७ ,, द्वितीय आर्यसिद्धान्त (महासिद्धान्त)४ २१०६ ,, आधुनिक यूरोपीय मत से५ विषुवद्वृत्तीय ७६२७ मील ध्रुवीय ७६०० ,, ऊपर के अंकों से प्रकट है कि वराहमिहिर, आर्यभट तथा लल्ल के योजन प्रायः समान हैं और सूर्य सिद्धान्त तथा सिद्धान्तशिरोमणि के भी योजन प्रायः समान हैं; परन्तु पहले के तीन आचार्यों का योजन इन दोनों के योजन का प्रायः डेढ़ गुना है । इसलिए इन्हीं दो प्रकार के योजनों की तुलना वर्तमान मील से की जायगी । हमारे सिद्धान्तों में पृथिवी को बिलकुल गोल माना गया है जिससे यह भेद नहीं रखा १. डाक्टर थीबो और पं० सुधाकर द्विवेदी संपादित पंचसिद्धान्तिका. पृष्ठ ३४ श्लोक १८ में भूपरिधि का मान ३२०० योजन दिया है जिसको ३.१४१६ से भाग देने पर १०१८.६ योजन पृथिवी का व्यास हुआ । २. आर्यभटीय पृष्ठ १०, प्रथम पाद का ५वाँ श्लोक । ३. गोलाध्याय पृष्ठ २०, भुवनकोश श्लोक ५२ । ४. महासिद्धान्त पृष्ठ १६१, भुवनकोश श्लोक ३५ । ५. Sir Robert Ball's Spherical Astronomy pp, 44.
५४ सूर्य सिद्धान्त गया कि विषुवद्वृत्तीय भूपरिधि ध्रुवीय भूपरिधि से भिन्न है । इसलिए तुलना के लिए ध्रुवीय भूपरिधि ही लेना उचित होगा क्योंकि आचार्यों ने इसी की नाप से भूपरिधि का परिमाण स्थिर किया था । इसलिए, आर्यभट के मत से १०५० योजन = ७६०० मील ∴ १ योजन = ७६०० / १०५० मील = ७·५२ मील यदि १ योजन में चार कोस हों तो १ कोस = ७.५२ / ४ मील = १.८८ मील सिद्धान्तशिरोमणि के मत से १५८१ योजन = ७६०० मील ∴ १ योजन = ७६०० / १५८१ मील = ५ मील ∴ १ कोस = ५/४ योजन = १ १/४ मील आजकल १ कोस २ मील के समान समझा जाता है इसलिए आजकल का योजन आर्यभट के योजन से बहुत मिलता है । सिद्धान्तशिरोमणि वाला कोस आज- कल के ‘गऊ-कोस’ (गो-कोस) के कदाचित् समान हो, जो किसी-किसी प्रान्त में अब तक प्रचलित है । अब प्रश्न यह रह गया कि भूपरिधि नापी कैसे गयी । सूर्य सिद्धान्त में इस विषय पर कुछ नहीं लिखा गया है । भास्कराचार्य १ कहते हैं कि उत्तर-दक्षिण-रेखा पर स्थित दो स्थानों की दूरी योजनों में नाप लो । उन दो स्थानों के अक्षांशों का भी अन्तर निकालो । फिर त्रैराशिक द्वारा यह जान लेना चाहिये कि जब इतने अक्षांशों में अन्तर होने से दो स्थानों की दूरी इतने योजन होती है तब ३६०° पर क्या होगी । इसकी उपपत्ति यह है : चित्र ७ में एक ही उत्तर-दक्षिण-रेखा पर स्थित दो स्थानों (स, सा) का योजनात्मक अन्तर स सा नापना चाहिये । फिर दोनों के अक्षांशांतर स भ सा कोण को जानना चाहिये । १. गोलाध्याय भुवनकोश, पृष्ठ १३ श्लोक १४— पुरान्तरं चेदिदमुत्तरं स्यात् तदक्ष विश्लेष लवैस्तदाकिम् । चक्रांशकैरित्यनुपातयुक्त्या युक्तं निरुक्तं परिधेः प्रमाणम् ॥ अथवा गणिताध्याय, पृष्ठ ५६ श्लोक १— याम्योदक पुरयोः पलान्तर हतं भूवेष्ठनं भांश हृत् । तद्भक्तस्य पुरान्तराध्वन इह ज्ञेयं समं योजनम् ॥
मध्यमाधिकार ५५ चित्र ७ भ = पृथ्वी का केन्द्र । वभ = विषुवद्वृत्तीय त्रिज्या । उ = उत्तरी ध्रुव या सुमेरु । स, सा एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा (meridian) के दो स्थान । स का अक्षांश = < व भ स । सा ,, = < व भ सा । दोनों के अक्षांशों का अन्तर = < स भ सा । फिर यह अनुपात करना चाहिए < स भ सा : ३६०° : : स सा : भूपरिधि ३६०° × स सा ∴ भूपरिधि = ----------------- < स भ सा अक्षांश निकालने की रीति त्रिप्रश्नाध्याय नामक तीसरे अध्याय में कई प्रकार से बतलाई जायगी । भूपरिधि इसी रीति से आजकल भी नापी जाती है; केवल सूक्ष्मयंत्रों के कारण अब अधिक शुद्धतापूर्वक यह काम किया जाता है ।
५६ सूर्य सिद्धान्त लम्बज्याघ्नस्त्रिज्योवाप्तस्फुटो भूपरिधिः स्वकः । तेन देशान्तराभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता ॥६०॥ कलादि तत्फलं प्राच्यां ग्रहेभ्यः प्रविशोधयेत् । रेखाप्रतीची संस्थानां प्रक्षिपेत्तु स्वदेशजम् ॥६१॥ अनुवाद—(६०) भूपरिधि को (अपने स्थान की) लम्बज्या से गुणा करके त्रिज्या से भाग देने पर अपने स्थान की स्फुट परिधि निकलती है । अपने स्थान के देशान्तर योजना को ग्रह की दैनिक गति से गुणा करके गुणनफल को इसी स्फुट परिधि से भाग देना चाहिये । (६१) (यदि दैनिक गति कला में ली गयी है तो) फल कला में आवेगा । यदि अपना स्थान लंका से पूरब में हो तो लंका की अर्द्धरात्रि के समय के मध्यमग्रह में से इस फल को घटाना चाहिये और यदि अपना स्थान लंका से पच्छिम में हो तो जोड़ना चाहिये । ऐसा करने से अपने स्थान की अर्द्धरात्रि के समय के मध्यम ग्रह (ग्रहों के मध्यम स्थान) निकल आते हैं ॥६०-६१॥ विज्ञान भाष्य—बीज-गणित के अनुसार इन श्लोकों को इस प्रकार प्रकट कर सकते हैं :— भूपरिधि × लम्बज्या स्फुट परिधि = ——————————— (१) त्रिज्या देशान्तर } देशान्तर योजन × ग्रह की दैनिक गति (कला में) फल } = —————————————————————— (२) स्फुट परिधि अपने स्थान की अर्द्धरात्रि के समय के मध्यम ग्रह = लंका की अर्द्धरात्रि के मध्यम ग्रह ± देशान्तर फल . (३) यदि स्थान लंका से पूरब हो तो ऋणात्मक चिह्न और पच्छिम हो तो धनात्मक चिह्न लेना चाहिये । इसकी उपपत्ति समझने के लिए पहले यह जानना चाहिये कि लम्बज्या, स्फुट परिधि, देशान्तर इत्यादि क्या हैं ? ज्या—यदि किसी समकोण त्रिभुज के किसी भुज की लम्बाई को उसके कर्ण की लम्बाई से भाग दे दिया जाय तो लब्धि उस भुज के सामने के कोण की ज्या कहलाती है । चित्र ८ में स भा भ एक समकोण त्रिभुज है; इसलिए इसके स भ भा कोण की ज्या = सभा / सभ और भ स भा कोण की ज्या = भभा / सभ । समकोण त्रिभुज के
मध्यमाधिकार ५७ स भ भा चित्र ८ कर्ण की लम्बाई किसी भुज की लम्बाई से अधिक होती है; इसलिए किसी भुज के सामने के कोण की ज्या एक से कम होगी इसलिए ज्या दशमलव भिन्न में लिखी जाती है । यह आजकल की प्रथा है । प्राचीन काल में जब कि दशमलव भिन्न का प्रचार नहीं था कोण की ज्या पूर्णाङ्कों में लिखी जाती थी । किसी कोण की ज्या जानने के लिए हमारे सिद्धान्तों में ऐसा वृत्त लिया गया है, जिसकी त्रिज्या (अर्द्धव्यास) ३४३८ इकाइयां और परिधि २१६०० इकाइयां होती हैं, जिससे एक-एक इकाई एक-एक कला के समान होती है । क्योंकि परिधि एक चक्र के समान होती है जिसमें ३६० अंश अथवा ३६० × ६० = २१६०० कलाएँ होती हैं । फिर केन्द्र से परिधि तक दो त्रिज्याएं ऐसी खींचते हैं जिनके बीच का कोण उस कोण के समान होता है जिसकी ज्या जानना है तथा त्रिज्या और परिधि के मिलन- विन्दु से दूसरी त्रिज्या पर लम्ब डालते हैं । इस लम्ब की लम्बाई जितनी इकाइयाँ (कलाएं) होती हैं उसी को उस कोण की ज्या कहते हैं । चित्र ६ में अ केन्द्र है; अ आ, अ उ तथा अ ऊ तीन त्रिज्याएं हैं जो अ से परिधि तक खींची गई हैं । उ या ऊ से उ इ या ऊ ई लम्ब अ आ पर डाले गये हैं । त्रिज्या की नाप ३४३८ इकाइयों में मानकर उ इ या ऊ ई को जो नाप इन्हीं इकाइयों में होगी वह उ अ इ कोण या
३८ सूर्य सिद्धान्त चित्र ६ ऊ अ ई कोण की ज्या कहलायेगी । जो लोग केवल आजकल की प्रथा से परिचित हैं उन्हें भ्रम हो सकता है; इसलिए उन्हें यह भेद अच्छी तरह समझ लेना चाहिये । त्रिज्या का मान ३४३८ इसलिए लिया गया कि जब परिधि कलाओं में विभाजित की जाती है तब त्रिज्या का मान ३४३७ ३/८ कला आजकल की सूक्ष्म गणना से ठहरता है जिसका निकटतम पूर्णाङ्क ३४३८ है। आजकल के एक रेडियन* (radian) में जितनी कलाएं होती हैं उतनी ही पूर्ण कलाओं के समान त्रिज्या का परिमाण माना गया है । स्फुट परिधि—भूतल का वह वृत्त जो उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों से समान अन्तर पर दोनों के बीचों बीच होता हुआ भू पृष्ठ को दो समान भागों में बाँटता है विषुवत् रेखा कहलाता है; विषुवत् रेखा के उत्तर वाले आधे भूगोल को उत्तर गोल और दक्षिण वाले को दक्षिण गोल कहते हैं । इस रेखा से आकाशीय ध्रुव (आकाश का वह विन्दु जो पृथ्वी के उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव के ठीक ऊपर होता है, उत्तरी ध्रुव तारा उत्तरी ध्रुव से प्रायः १° दूर है) क्षितिज पर दिखाई देते हैं । यहाँ पर अक्षांश शून्य और लम्बांश ९०° होता है। इसलिए विषुवत् रेखा को निरक्षवृत्त भी कहते हैं। चित्र १० में व वा वि विषुवत् रेखा है । यदि किसी स्थान 'स' से निरक्षवृत्त के समानान्तर स सा सि वृत्त (Parallel of latitude) भूतल पर खींचा जाय तो इसके परिमाण को 'स' स्थान की स्फुट परिधि कहते हैं । विषुवत् रेखा से
- १ रेडियन = ५७°•२९५८ = ३४३७•७४८ कला
मध्यमाधिकार ५६ चित्र १० भ = पृथ्वी का केन्द्र । उ = पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव (सुमेरु) । द = पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव (कुमेरु) । व = विषुवत् रेखा का वह विन्दु जो स के ठीक दक्षिण है । स = अभीष्ट स्थान; उसवद स स्थान की उत्तर-दक्षिण रेखा । ∠ व भ स = स का अक्षांश । ∠ स भ उ = स का लम्बांश । उ द = पृथ्वी का अक्ष । स भ = स से पृथ्वी के अक्ष की दूरी = स स्थान की लम्बज्या, सिद्धान्तीय पद्धति से जैसे-जैसे उत्तर या दक्षिण जाइये तैसे-तैसे स्फुट परिधि कम होती जाती है यहां तक कि ध्रुवों पर स्फुट परिधि शून्य हो जाती है । इसी तरह अक्षांश बढ़ता जाता है और लम्बांश कम होता जाता है और ध्रुवों पर अक्षांश ९०° और लम्बांश शून्य हो जाता है । चित्र से यह भी प्रकट है कि 'स' स्थान की स्फुट परिधि स सा सि की
६० सूर्य सिद्धान्त त्रिज्या 'स भा' है जो 'स' की लम्बज्या भी कहलाती है, क्योंकि स का लम्बांश < स भ उ है जिसके सामने की भुज स भा है । रेखागणित से यह सिद्ध है कि दो वृत्तों की परिधियों में वही अनुपात होता है जो उनकी त्रिज्याओं या व्यासों में होता है इसलिए, व भ : स भा :: व वा वि : स सा सि ∵ स सा सि = (व वा वि × स भा) / व भ = (भू परिधि × लम्बज्या) / त्रिज्या , जब त्रिज्या ३४३८ हो और लम्बज्या का मान सिद्धान्तीय पद्धति के अनुसार कलाओं में हो जिसकी सारिणी दूसरे अध्याय में दी हुई । यदि आजकल की प्रथा के अनुसार स्फुट परिधि निकालना हो तो स सा सि = भूपरिधि × लम्बज्या (Sine of Colatitude) जबकि लम्बांश की ज्या दशमलव में दी हुई हो (क्योंकि इस रीति से लम्बज्या = स भा / स भ = स भा / व भ) देशान्तर—चित्र ११ भूगोल के आधे गोले के पृष्ठ का चित्र है जिसमें उत्तर गोल के सी, अ, स, सा स्थानों के अक्षांश एक ही हैं इसलिए इन चारों स्थानों की
[चित्र ११: उपर: उ गोलक के अंदर बिन्दु / रेखाएँ: का, क, सी, अ, स, सा, व, वा, पी, ल, प, पा, स नीचे: द चित्र ११]
मध्यमाधिकार ६१ स्फुट परिधि भी एक ही है। इन स्थानों की उत्तर-दक्षिण-रेखा (Meridian) क्रम से उ सी पी द, उ अ ल द, उ स प द और उ सा पा द हैं। यदि उ अ ल द रेखा पर अ अवन्ती (उज्जैन) और ल लंका के स्थान हों तो इसको भारतवर्ष की मध्य रेखा (standard meridian) कहेंगे; जैसे आजकल ग्रीनविच से जाने वाली उत्तर- दक्षिण-रेखा यूरोप और अमेरिका वालों की भूमध्य रेखा कही जाती है। किसी स्थान की स्फुट परिधि का वह खंड जो उस स्थान की उत्तर-दक्षिण-रेखा और मध्य रेखा के बीच में पड़ जाता है उस स्थान का देशान्तर (योजनों में) (Difference of longitude in yojan) कहलाता है, जैसे स का देशान्तर स अ, सा का देशान्तर सा अ और सी का देशान्तर सीअ हुए। इसी तरह प का देशान्तर प ल, पा का देशान्तर पा ल और पी का देशान्तर पी ल हुए। चित्र से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि प, स एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर है तथापि प, स के देशान्तर (योजनों में) समान नहीं है क्योंकि स की स्फुट परिधि प की स्फुट परिधि (भूपरिधि) से छोटी है। यदि इसी रेखा पर कोई स्थान क हो तो इसका देशान्तर क का (योजनों में) और भी छोटा होगा। ६०वें श्लोक में देशान्तर का शब्द इसी परिभाषा के अनुसार प्रयुक्त हुआ है। परन्तु यह परिभाषा सरल तथा व्यवहारोपयोगी नहीं है। आगे चलकर ६४वें श्लोक में देशान्तर नाड़ी की चर्चा है। यह भी देशान्तर की एक परिभाषा है जो सरल है; इसलिए इस जगह उसको भी समझा देना उचित होगा। एक ही उत्तर-दक्षिण रेखा पर जितने स्थान हैं सब में जैसे क, स, प, ख स्थानों में मध्याह्न या अर्द्ध-रात्रि एक ही समय होती है। परन्तु जो स्थान इस रेखा से पूरब है वहां मध्याह्न या अर्द्धरात्रि पहले और जो स्थान पच्छिम हैं वहाँ पीछे होती है। स पर अ से (मध्य रेखा से) जितना पहले मध्याह्न होता है उतने ही समय को हम स का पूर्व देशान्तर काल (Time difference of longitude) कहते हैं। इसे हम समय की इकाइयों में प्रकट कर सकते हैं; यदि घड़ी पल में लिखें तो इसे देशान्तर घटिका या देशान्तर-नाड़ी कहेंगे और यदि घंटे मिनट में लिखें तो देशान्तर घंटा या मिनट कहेंगे। इस परिभाषा से हमको यह सुविधा होती है कि एक ही बात से हम क, स, प, ख सब का देशान्तर सहज ही प्रकट कर सकते हैं, जब कि योजनों में इनके देशान्तर भिन्न-भिन्न लिखने पड़ेंगे। इसी प्रकार सी पर मध्य रेखा से जितना पीछे मध्याह्न होता है उस समय को सी का पच्छिम देशान्तर काल कहेंगे। आगे पीछे मध्याह्न या मध्यरात्रि इसलिए होती है कि पृथ्वी २४ घंटे में या ६० घड़ी में एक बार अपने अक्ष पर पच्छिम से पूरब की ओर लट्टू की तरह घूम जाती है जिससे सूरज चाँद तारे इत्यादि आकाशीय पिंड पूरब से पच्छिम को चक्कर
६२ सूर्य सिद्धान्त
लगाते हुए जान पड़ते हैं। आकाशीय पिंडों की इस प्रत्यक्ष गति को ही हमारे सिद्धान्तों में प्रवह-वायु-जनित गति कहा गया है। आगे सुविधा के लिए सूरज को ही कभी-कभी चक्कर लगाता हुआ लिखा जायगा, क्योंकि ऐसा मान लेने से हिसाब में कोई बाधा नहीं पहुँचती ।
चित्र १२
चित्र १२ में भ पृथ्वी का केन्द्र और प, ल विषुवत् रेखा पर के दो स्थान हैं; प भ पृथ्वी का अर्द्धव्यास है जो चित्र को स्पष्ट करने के लिए बहुत बढ़ाकर खींचा गया है, यथार्थ में सूर्य की दूरी पृथ्वी के अर्द्धव्यास की कोई तेईस हजार गुनी है। सूर्य पृथ्वी के चारों ओर ६० घड़ी में र रा रि री...मार्ग से एक बार चक्कर लगा लेता है। विषुवत् रेखा को छूती हुए र प रु एक स्पर्श-रेखा है जो प की क्षितिज कहलाती है। जब सूर्य इसके ऊपर रहता है तब प स्थान से दिखाई पड़ता है। जब सूर्य क्षितिज से ऊपर 'र' विन्दु के पास आवेगा तब प निवासियों के लिए सूर्योदय होगा। प में जिस समय मध्याह्न होगा उस समय सूर्य रि पर रहेगा। जब वह रु पर आवेगा तब प-निवासियों को डूबता हुआ देख पड़ेगा और जब रे पर आवेगा तब प में मध्यरात्रि होगी । इसी प्रकार ल स्थान से सूर्य का उदय उस समय देख पड़ेगा जब वह रा' पर होगा, मध्याह्न उस समय होगा जब वह 'री' पर रहेगा, सूर्यास्त उस
मध्यमाधिकार ६३ समय होगा जब वह 'रु' पर रहेगा और अर्द्धरात्रि उस समय होगी जब वह 'रै' पर रहेगा । चित्र से यह स्पष्ट है कि जिस समय 'प' पर सूर्योदय होगा उस समय से उतनी देर पीछे 'ल' पर सूर्योदय होगा जितनी देर में सूर्य 'र' से 'रा' तक जाता है । परन्तु र से रा तक जाने में उसको र च रा कोण अथवा प भ ल कोण घूमना पड़ता है क्योंकि परिधि की दो स्पर्श-रेखाओं के बीच का कोण स्पर्श-बिन्दुओं से खींची गयी त्रिज्याओं के बीच के कोण के समान होता है । यह बात मध्याह्न काल या मध्यरात्रि की सूर्य की स्थितियों से और भी सरलतापूर्वक समझ में आयगी; क्योंकि यह बतलाया ही जा चुका है कि सूर्य के 'रि' पर आने से 'प' पर और 'री' पर आने से 'ल' पर मध्याह्न होता है इसलिए जितनी देर में सूर्य रि' से 'री' तक जाती है प की अपेक्षा उतनी ही देर पीछे ल पर मध्याह्न होगा । इसी समय को 'प' 'ल' के बीच का देशान्तर काल कहते हैं । प, ल के देशान्तर को प भ ल कोण से भी प्रकट कर सकते हैं और देशान्तर को अंश, कला विकला में भी लिख सकते हैं चाहे देशान्तर प्रकट करने की इकाई घड़ी पल में हो, चाहे अंश कला में, दोनों तरह से सुविधा होती है और जहाँ जिसकी आवश्यकता पड़ती है वहाँ वही लिखते हैं । यह स्पष्ट ही है कि ६० घड़ी में अथवा २४ घंटे में सूरज एक चक्कर अर्थात् ३६०° चलता है इसलिए एक घड़ी में ६° और १ घंटों में १५° चलेगा; इसलिए यदि दो स्थानों का देशान्तर एक अंश हो तो उन दोनों के मध्याह्न काल या मध्यरात्रि के समयों में १० पल अथवा ४ मिनट का अन्तर होगा । संक्षेप में यों लिखा जाता है कि दोनों का देशान्तर १°, १० पल अथवा ४ मिनट है । साधारणतः मध्य रेखा से देशान्तर नापने की परिपाटी है । जो स्थान मध्य रेखा से पूरब में है उनके देशान्तर के पहले 'पूर्व' और जो पच्छिम में हैं उनके देशान्तर के पहले 'पच्छिम' अवश्य लिख देना चाहिये, नहीं तो भ्रम होने का डर रहता है । चित्र से यह भी सहज ही जाना जा सकता है कि यदि लंका (ल) की अर्द्ध रात्रि के समय का किसी ग्रह का मध्यम स्थान निकाला जाय तो वह 'प' स्थान की अर्द्ध रात्रि के समय का भी मध्यम स्थान नहीं होगा क्योंकि प लंका से पूरब है इसलिए वहाँ अर्द्ध रात्रि पहले ही हो जायगी और ग्रह सदा गतिमान होने के कारण लंका के मध्यम स्थान से कुछ पहले रहेगा । कितना पहले रहेगा, इसकी जानकारी त्रैराशिक द्वारा करनी चाहिये कि जब ६० घड़ी में ग्रह इतना चलता है तो 'प' की देशान्तर घड़ी में कितना चलेगा । जो आवे वह लंका की अर्द्ध रात्रि के मध्यम स्थान से घटा देना चाहिये । यदि स्थान मध्य रेखा से पच्छिम हो तो वहाँ मध्य रात्रि लंका की मध्य रात्रि से उस स्थान की देशान्तर घड़ी के समान पीछे होगी और ग्रह इतनी