सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ सूर्य सिद्धान्त गया कि विषुवद्वृत्तीय भूपरिधि ध्रुवीय भूपरिधि से भिन्न है । इसलिए तुलना के लिए ध्रुवीय भूपरिधि ही लेना उचित होगा क्योंकि आचार्यों ने इसी की नाप से भूपरिधि का परिमाण स्थिर किया था । इसलिए, आर्यभट के मत से १०५० योजन = ७६०० मील ∴ १ योजन = ७६०० / १०५० मील = ७·५२ मील यदि १ योजन में चार कोस हों तो १ कोस = ७.५२ / ४ मील = १.८८ मील सिद्धान्तशिरोमणि के मत से १५८१ योजन = ७६०० मील ∴ १ योजन = ७६०० / १५८१ मील = ५ मील ∴ १ कोस = ५/४ योजन = १ १/४ मील आजकल १ कोस २ मील के समान समझा जाता है इसलिए आजकल का योजन आर्यभट के योजन से बहुत मिलता है । सिद्धान्तशिरोमणि वाला कोस आज- कल के ‘गऊ-कोस’ (गो-कोस) के कदाचित् समान हो, जो किसी-किसी प्रान्त में अब तक प्रचलित है । अब प्रश्न यह रह गया कि भूपरिधि नापी कैसे गयी । सूर्य सिद्धान्त में इस विषय पर कुछ नहीं लिखा गया है । भास्कराचार्य १ कहते हैं कि उत्तर-दक्षिण-रेखा पर स्थित दो स्थानों की दूरी योजनों में नाप लो । उन दो स्थानों के अक्षांशों का भी अन्तर निकालो । फिर त्रैराशिक द्वारा यह जान लेना चाहिये कि जब इतने अक्षांशों में अन्तर होने से दो स्थानों की दूरी इतने योजन होती है तब ३६०° पर क्या होगी । इसकी उपपत्ति यह है : चित्र ७ में एक ही उत्तर-दक्षिण-रेखा पर स्थित दो स्थानों (स, सा) का योजनात्मक अन्तर स सा नापना चाहिये । फिर दोनों के अक्षांशांतर स भ सा कोण को जानना चाहिये । १. गोलाध्याय भुवनकोश, पृष्ठ १३ श्लोक १४— पुरान्तरं चेदिदमुत्तरं स्यात् तदक्ष विश्लेष लवैस्तदाकिम् । चक्रांशकैरित्यनुपातयुक्त्या युक्तं निरुक्तं परिधेः प्रमाणम् ॥ अथवा गणिताध्याय, पृष्ठ ५६ श्लोक १— याम्योदक पुरयोः पलान्तर हतं भूवेष्ठनं भांश हृत् । तद्भक्तस्य पुरान्तराध्वन इह ज्ञेयं समं योजनम् ॥