भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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मध्यमाधिकार ५३ अनुसार २२/७, ३.१४, ३.१४२, ३.१४१६ इत्यादि जैसा आवश्यक हो लिया जा सकता है । इस श्लोक में दूसरा शब्द 'योजन' बड़े महत्व का है । आजकल लोग योजन को साधारणतः चार कोस का समझते हैं परन्तु कोस का मान स्वयम् स्थिर नहीं है । किसी-किसी प्रान्त में कोस बहुत छोटा होता है और किसी प्रान्त में बहुत बड़ा । इसी प्रकार योजन का भी परिमाण स्थिर नहीं है । यही कारण है कि भिन्न-भिन्न सिद्धान्तों में भूपरिधि या भूव्यास के मान भिन्न-भिन्न अंकों में दिये हुए हैं । नीचे लिखे अवतरणों से प्रकट होगा कि सिद्धान्तों में भूव्यास के मान क्या दिये हुए हैं:— पंचसिद्धान्तिका के१ मत से भूव्यास १०१८ ८/६० योजन आर्यभट२ और लल्ल ,, ,, १०५० ,, वर्तमान सूर्यसिद्धान्त ,, ,, १६०० ,, सिद्धान्त शिरोमणि३ ,, ,, १५८१ १५/३७ ,, द्वितीय आर्यसिद्धान्त (महासिद्धान्त)४ २१०६ ,, आधुनिक यूरोपीय मत से५ विषुवद्वृत्तीय ७६२७ मील ध्रुवीय ७६०० ,, ऊपर के अंकों से प्रकट है कि वराहमिहिर, आर्यभट तथा लल्ल के योजन प्रायः समान हैं और सूर्य सिद्धान्त तथा सिद्धान्तशिरोमणि के भी योजन प्रायः समान हैं; परन्तु पहले के तीन आचार्यों का योजन इन दोनों के योजन का प्रायः डेढ़ गुना है । इसलिए इन्हीं दो प्रकार के योजनों की तुलना वर्तमान मील से की जायगी । हमारे सिद्धान्तों में पृथिवी को बिलकुल गोल माना गया है जिससे यह भेद नहीं रखा १. डाक्टर थीबो और पं० सुधाकर द्विवेदी संपादित पंचसिद्धान्तिका. पृष्ठ ३४ श्लोक १८ में भूपरिधि का मान ३२०० योजन दिया है जिसको ३.१४१६ से भाग देने पर १०१८.६ योजन पृथिवी का व्यास हुआ । २. आर्यभटीय पृष्ठ १०, प्रथम पाद का ५वाँ श्लोक । ३. गोलाध्याय पृष्ठ २०, भुवनकोश श्लोक ५२ । ४. महासिद्धान्त पृष्ठ १६१, भुवनकोश श्लोक ३५ । ५. Sir Robert Ball's Spherical Astronomy pp, 44.