सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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ठीक सम्बन्ध मालूम नहीं था; क्योंकि दूसरे अध्याय में अर्द्धव्यास और परिधि का
अनुपात ३४३८ : २१६०० माना गया है, जिससे परिधि व्यास का ३.१४१३६ गुना
ठहरती है । इसलिए इस श्लोक में परिधि को व्यास का √१०, सुविधा के लिए,
गणित की क्रिया संक्षेप करने के लिए, माना गया है; जैसे आजकल जब स्थूल रीति
से काम लेना होता है तब कोई इसको २२/७ और कोई ३.१४ मानते हैं और जहाँ
बहुत सूक्ष्म गणना करने की आवश्यकता पड़ती है वहाँ दशमलव के पांच-पांच सात-
सात स्थानों तक इसको शुद्ध लेना पड़ता है ।
भिन्न-भिन्न सिद्धान्तों में इस सम्बन्ध का मान क्या लिया गया है यह नीचे
के अवतरण से जान पड़ेगा ।
सूर्यसिद्धान्त \ व्यास : परिधि व्यास : परिधि
ब्रह्मगुप्त१ } १ : √ १० अर्थात् १ : ३.१६२३
द्वितीय आर्यभट२ /
प्रथम आर्यभट३ २०००० : ६२८३२ ,, १ : ३.१४१६
द्वितीय आर्यभट२ \ २२ : ७ अर्थात् १ : ३.१४२८
भास्कराचार्य४ /
भास्कराचार्य४ १२५० : ३९२७ ,, १ : ३.१४१६
३४३८ कला को
त्रिज्या मानने से, जो
ब्राह्मस्फुट के सिवा > ६८७६ : २१६०० ,, १ : ३.१४१३६
सभी सिद्धान्तों में /
पाया जाता है । /
आजकल के सूक्ष्म गणित से १ : ३.१४१५९२७ .
भास्कराचार्य और द्वितीय आर्यभट ने दो प्रकार से व्यास और परिधि का
संबंध बतलाया है, एक सूक्ष्म तथा दूसरा स्थूल और व्यवहारोपयोगी । आगे व्यास
और परिधि के सम्बन्ध को π चिह्न से सूचित किया जायगा जैसी कि आज कल
प्रथा है अर्थात् यदि व्यास १ है तो परिधि π है, जब कि π का मान व्यवहार के
१. ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त गोलाध्याय श्लोक १५ ।
२. महासिद्धान्त पाटीगणिताध्याय श्लोक ८८, ६२ ।
३. आर्यभटीय पृष्ठ २६ श्लोक १०, (ब्रह्मप्रेस इटावा का छपा) ।
४. लीलावती पृष्ठ ५४ क्षेत्रव्यवहाराध्याय श्लोक ४० ।