सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार ५१ समान थे; क्योंकि त्रेता के आदि से कलियुग के आदि तक आधा महायुग होता है जितने समय में सब ग्रह पूरे-पूरे भगण करते हैं । हाँ चन्द्रमा का उच्च एक महायुग में विषम भगण करने के कारण मकर के आदि में न होकर कर्क के आदि में था, परन्तु पात तुला के ही आदि में था । यह मत सूर्यसिद्धान्त का है। भास्कराचार्य १ के अनुसार कलियुग के आदि में सूर्य चन्द्रमा के सिवा अन्य ग्रहों के मध्यम स्थान यह थे :- मंगल बुध गुरु शुक्र शनि चंद्रोच्च राहु* राशि ११ ११ ११ ११ ११ ४ ५ अंश २६ २७ २६ २८ २८ ५ ३ कला ३ २४ २७ ४२ ४६ २६ १२ विकला ५० २६ ३६ १४ ३४ ४६ ५८ यहाँ तक तो वह रीति बतलायी गयी है, जिससे ग्रहों का मध्यस्थान लंका या उज्जैन की आधी रात के समय का निकलता है। आगे के श्लोकों में लंका के पूरब पच्छिम के देशों में आधी रात के समय ग्रहों का मध्य स्थान जानने की रीति बतलायी जायगी । योजनानि शतान्यष्टौ भूकर्णो द्विगुणानि तु । तद्वर्गतो दशगुणात्पदं भूपरिधिर्भवेत् ॥ ५६ ॥ अनुवाद-पृथ्वी का व्यास ८०० के दूने १६०० योजन है; इसके वर्ग का १० गुना करके गुणनफल का वर्गमूल निकालने से जो आता है वह पृथ्वी की परिधि है ॥ ५६ ॥ विज्ञान भाष्य—यदि पृथ्वी का व्यास 'व' मान लिया जाय तो इसकी परिधि = √व² × १० = व × √१० = व × ३·१६२३, जिससे सिद्ध होता है कि परिधि व्यास का ३·१६२३ गुना होती है । आजकल यह सम्बन्ध ३·१४१६ दशमलव के चार स्थान तक शुद्ध समझा जाता है जो ३·१६२३ से बहुत भिन्न है । परन्तु इससे यह न समझ लेना चाहिये कि सूर्यसिद्धान्तकार को व्यास और परिधि का ठीक- १. सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ ३२-३३; कलकत्ते की १८१५ ई० की छपी ।
- राहु की यह स्थिति कलकत्ते की छपी सिद्धान्त शिरोमणि में तथा म. म. पं० बापूदेव शास्त्री की संपादित सिद्धान्त शिरोमणि में लिखी है; परन्तु मेरी गणना से इसको ६ राशि २६ अंश ४७ कला २·४ वि० पर कलियुग के आरम्भ में होना चाहिये जो १२ राशियों में से ऊपर दी हुई स्थिति को घटाने से आती है ।